पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिखण्ड ] * कुञ्जलका च्यवनको अपने पूर्व-जीवनका वृत्तान्त बताकर ज्ञानका उपदेश करना * ३३१
भूमिखण्ड। अब भूमिखण्डके माहात्म्यका वर्णन आरम्भ करता हूँ। जो श्रेष्ठ मनुष्य इस खण्डके एक श्लोकका भी श्रवण करता है, उसके एक दिनका पाप नष्ट हो जाता है। जो श्रेष्ठ बुद्धिसे युक्त पुरुष इसके एक अध्यायको सुनता है, उसे पर्वके अवसरपर ब्राह्मणोंको एक हजार गोदान देनेका फल मिलता है। साथ ही उसपर भगवान् श्रीविष्णु भी प्रसन्न होते हैं। जो इस पद्मपुराणका प्रतिदिन पाठ करता है, उसपर कलियुगमें कभी विघ्नोंका आक्रमण नहीं होगा। ब्राह्मणो! अश्वमेध यज्ञका जो फल बतलाया जाता है, इस पद्मपुराणके पाठसे उसी फलकी प्राप्ति होती है। पुण्यमय अश्वमेध यज्ञ कलियुगमें नहीं होता, अतः उस समय यह पुराण ही अश्वमेधके समान फल देनेवाला है। कलियुगमें मनुष्य प्रायः पापी होते हैं, अतः उन्हें नरकके समुद्रमें गिरना पड़ता है; इसलिये उनको चाहिये कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंके साधक इस पुण्यमय पुराणका श्रवण करें। जिसने पुण्यके साधनभूत इस पद्मपुराणका श्रवण किया, उसने चतुर्वर्गके समस्त साधनोंको सिद्ध कर लिया। इसका श्रवण करनेवाले मनुष्यके ऊपर कभी भारी विघ्नका आक्रमण नहीं होता। धर्मपरायण पुरुषोंको पूरी पुराणसंहिताका श्रवण करना चाहिये। इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी भी सिद्धि होती है। भूमिखण्डका श्रवण करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा रोग, दुःख और शत्रुओंके भयसे भी छुटकारा पाकर सदा सुखका अनुभव करता है। पद्मपुराणमें पहला सृष्टिखण्ड, दूसरा भूमिखण्ड, तीसरा स्वर्गखण्ड, चौथा पातालखण्ड और पाँचवाँ सब पापोंका नाश करनेवाला उत्तरखण्ड है।* ब्राह्मणो! इन पाँचों खण्डोंको सुननेका अवसर बड़े भाग्यसे प्राप्त होता है। सुननेपर ये मोक्ष प्रदान करते हैं—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
\begin{gathered} \star \ ॥ भूमिखण्ड समाप्त ॥ \ \star \end{gathered}
* प्रथमं सृष्टिखण्डं हि भूमिखण्डं द्वितीयकम्। तृतीयं स्वर्गखण्डं च पातालं च चतुर्थकम्॥
पञ्चमं चोत्तरं खण्डं सर्वपापप्रणाशनम्। .................................. ॥ (१२५।४८-४९)