भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


जम्बूमार्ग आदि तीर्थ, नर्मदा नदी, अमरकण्टक पर्वत तथा कावेरी-सङ्गमकी महिमा

वसिष्ठजी कहते हैं—राजन्! पृथ्वीकी परिक्रमा आरम्भ करनेवाले मनुष्यको पहले जम्बूमार्गमें प्रवेश करना चाहिये। वह पितरों, देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा पूजित तीर्थ है। जम्बूमार्गमें जाकर मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है और अन्तमें विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य प्रतिदिन छठे पहरमें एक बार भोजन करते हुए पाँच राततक उस तीर्थमें निवास करता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती तथा वह परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है। जम्बूमार्गसे चलकर तुण्डुलिकाश्रमकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ जानेसे मनुष्य दुर्गतिमें नहीं पड़ता तथा स्वर्गलोकमें उसका सम्मान होता है। राजन्! जो अगस्त्याश्रममें जाकर देवताओं और पितरोंकी पूजा करता और वहाँ तीन रात उपवास करके रहता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। तथा जो शाक या फलसे जीवन-निर्वाह करते हुए वहाँ निवास करता है, वह परम उत्तम कार्तिकेयजीके धामको प्राप्त होता है। राजाओंमें श्रेष्ठ दिलीप ! लक्ष्मीसे सेवित तथा समस्त लोकोंद्वारा पूजित कन्याश्रम तीर्थ धर्मारण्यके नामसे प्रसिद्ध है, वह पुण्यदायक और प्रधान क्षेत्र है; वहाँ पहुँचकर उसमें प्रवेश करने मात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो नियमानुकूल आहार करके शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करते हुए वहाँ देवता तथा पितरोंका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले यज्ञका फल पाता है। उस तीर्थकी परिक्रमा करके ययाति-पतन नामक स्थानको जाना चाहिये। वहाँकी यात्रा करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है।

तदनन्तर, नियमानुकूल आहार और आचारका पालन करते हुए [उज्जैनमें स्थित] महाकाल तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ कोटितीर्थमें स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है। वहाँसे धर्मज्ञ पुरुषको भद्रवट नामक स्थानमें जाना चाहिये, जो भगवान् उमापतिका तीर्थ है। वहाँकी यात्रा करनेसे एक हजार गोदानका फल मिलता है तथा महादेवजीकी कृपासे शिवगणोंका आधिपत्य प्राप्त होता है। नर्मदा नदीमें जाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करके मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है।

युधिष्ठिर बोले—द्विजश्रेष्ठ नारदजी ! मैं पुनः नर्मदाका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ।

नारदजीने कहा—राजन्! नर्मदा सब नदियोंमें श्रेष्ठ है। वह समस्त पापोंका नाश करनेवाली तथा स्थावर-जङ्गम सम्पूर्ण भूतोंको तारनेवाली है। सरस्वतीका जल तीन सप्ताहतक स्नान करनेसे, यमुनाका जल एक सप्ताहतक गोता लगानेसे और गङ्गाजीका जल स्पर्शके समय ही पवित्र करता है; किन्तु नर्मदाका जल दर्शनमात्रसे पवित्र कर देता है। नर्मदा तीनों लोकोंमें रमणीय तथा पावन नदी है। महाराज ! देवता, असुर, गन्धर्व और तपोधन ऋषि—ये नर्मदाके तटपर तपस्या करके परम सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। युधिष्ठिर ! वहाँ स्नान करके शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करते हुए जो जितेन्द्रियभावसे एक रात भी उसके तटपर निवास करता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जो मनुष्य जनेश्वर तीर्थमें स्नान करके विधिपूर्वक पिण्डदान देता है, उसके पितर महाप्रलयतक तृप्त रहते हैं। अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर कोटि रुद्रोंकी प्रतिष्ठा हुई है; जो वहाँ स्नान करता और चन्दन एवं फूल-माला आदि चढ़ाकर रुद्रकी पूजा करता है, उसपर रुद्रकोटिस्वरूप भगवान् शिव प्रसन्न होते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। पर्वतके पश्चिम भागमें स्वयं भगवान् महेश्वर विराजमान हैं। वहाँ स्नान करके पवित्र हो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए जितेन्द्रियभावसे शास्त्रीय विधिके अनुसार श्राद्ध करना चाहिये तथा वहीं तिल और जलसे पितरों तथा देवताओंका तर्पण भी करना चाहिये। पाण्डुनन्दन ! जो ऐसा करता है, उसकी सातवीं पीढ़ीतकके सभी लोग स्वर्गमें निवास करते हैं।

राजा युधिष्ठिर ! सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदाकी लंबाई

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