भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


वहाँ कावेरी-संगमका जल सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो लोग उस संगमकी महिमाको नहीं जानते, वे बड़े भारी लाभसे वञ्चित रह जाते हैं। अतः मनुष्यको सर्वथा प्रयत्न करके वहाँ स्नान करना चाहिये। कावेरी और महानदी नर्मदा दोनों ही परम पुण्यदायिनी हैं। महाराज ! वहाँ स्नान करके वृषभध्वज भगवान् शङ्करका पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करके मनुष्य जिस फलको प्राप्त करता है, वही फल उसे कावेरी-नर्मदा-संगममें स्नान करनेसे भी मिलता है। राजेन्द्र ! इस प्रकार नर्मदा-कावेरी-संगमकी बड़ी महिमा है। वहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला महान् पुण्यफल प्राप्त होता है।

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नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन

**नारदजी कहते हैं—**युधिष्ठिर ! नर्मदाके उत्तर तटपर 'पत्रेश्वर' नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जिसका विस्तार चार कोसका है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला उत्तम तीर्थ है। राजन् ! वहाँ स्नान करके मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। वहाँसे 'गर्जन' नामक तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ [रावणका पुत्र] मेघनाद गया था; उसी तीर्थके प्रभावसे उसको 'इन्द्रजित्' नाम प्राप्त हुआ था। वहाँसे 'मेघराव' तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ मेघनादने मेघके समान गर्जना की थी तथा अपने परिकरोंसहित उसने अभीष्ट वर प्राप्त किये थे। राजा युधिष्ठिर ! उस स्थानसे 'ब्रह्मावर्त' नामक तीर्थको जाना चाहिये, जहाँ ब्रह्माजी सदा निवास करते हैं। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

तदनन्तर अङ्गारेश्वर तीर्थमें जाकर नियमित आहार ग्रहण करते हुए नियमपूर्वक रहे। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो रुद्रलोकमें जाता है। वहाँसे परम उत्तम कपिला तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको गोदानका फल प्राप्त होता है। तत्पश्चात् कुण्डलेश्वर नामक उत्तम तीर्थमें जाय, जहाँ भगवान् शङ्कर पार्वतीजीके साथ निवास करते हैं। राजेन्द्र ! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य देवताओंके लिये भी अवध्य हो जाता है। वहाँसे पिप्पलेश्वर तीर्थकी यात्रा करे, वह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ है। वहाँ जानेसे रुद्रलोकमें सम्मान-पूर्वक निवास प्राप्त होता है। इसके बाद विमलेश्वर तीर्थमें जाय; वह बड़ा निर्मल तीर्थ है; उस तीर्थमें मृत्यु होनेपर रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। तदनन्तर पुष्करिणीमें जाकर स्नान करना चाहिये; वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य इन्द्रके आधे सिंहासनका अधिकारी हो जाता है। नर्मदा समस्त सरिताओंमें श्रेष्ठ है, वह स्थावर-जङ्गम समस्त प्राणियोंका उद्धार कर देती है। मुनि भी इस श्रेष्ठ नदी नर्मदाका स्तवन करते हैं। यह समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे भगवान् रुद्रके शरीरसे निकली है। यह सदा सब पापोंका अपहरण करनेवाली और सब लोगोंके द्वारा अभिवन्दित है। देवता, गन्धर्व और अप्सरा—सभी इसकी स्तुति करते रहते हैं—'पुण्यसलिला नर्मदा ! तुम सब नदियोंमें प्रधान हो, तुम्हें नमस्कार है। सागरगामिनी ! तुमको प्रणाम है। ऋषिगणोंसे पूजित तथा भगवान् शङ्करके श्रीविग्रहसे प्रकट हुई नर्मदे ! तुम्हें बारंबार नमस्कार है। सुमुखि ! तुम धर्मको धारण करनेवाली हो, तुम्हें प्रणाम है। देवताओंका समुदाय तुम्हारे चरणोंमें मस्तक झुकाता है, तुम्हें नमस्कार है। देवि ! तुम समस्त पवित्र वस्तुओंको भी परम पावन बनानेवाली हो, सम्पूर्ण संसार तुम्हारी पूजा करता है; तुम्हें बारंबार नमस्कार है।'*


* नमः पुण्यजले आद्ये नमः सागरगामिनि। नमोऽस्तु ते ऋषिगणैः शंकरदेहनिःसृते ॥
नमोऽस्तु ते धर्मभृते वरानने नमोऽस्तु ते देवगणैकवन्दिते । नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने नमोऽस्तु ते सर्वजगत्सुपूजिते ॥
(१८। १७-१८)