भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] \hfill * शेषजीका रामाश्वमेधकी कथा आरम्भ करना * \hfill ४११


कथारूपी महासागरकी थाह लगानेके लिये मेरे-जैसे मशक-समान तुच्छ जीवकी कितनी शक्ति है। तथापि मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपसे श्रीराम-कथाका वर्णन करूँगा; क्योंकि अत्यन्त विस्तृत आकाशमें भी पक्षी अपनी गमन-शक्तिके अनुसार उड़ते ही हैं। श्रीरघुनाथजीका चरित्र करोड़ों श्लोकोंमें वर्णित है। जिनकी जैसी बुद्धि होती है, वे वैसा ही उसका वर्णन करते हैं। जैसे अग्निके सम्पर्कसे सोना शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीकी उत्तम कीर्ति मेरी बुद्धिको भी निर्मल बना देगी।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! मुनिवर वात्स्यायनसे यों कहकर भगवान् शेषने ध्यानस्थ हो अपनी आँखें बंद कर लीं और ज्ञानदृष्टिके द्वारा उस लोकोत्तर कल्याणमयी कथाका अवलोकन किया। फिर तो अत्यन्त हर्षके कारण उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे गद्गदवाणीसे युक्त होकर दशरथ-नन्दन श्रीरघुनाथजीकी विशद कथाका वर्णन करने लगे।

भगवान् शेष बोले—वात्स्यायनजी ! देवता और दानवोंको दुःख देनेवाले लङ्कापति रावणके मारे जानेपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंको बड़ा सुख मिला। वे आनन्द-मग्न होकर दासकी भाँति भगवान्‌के चरणोंमें पड़ गये और उनकी स्तुति करने लगे।

तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी धर्मात्मा विभीषणको लङ्काके राज्यपर स्थापित करके सीताके साथ पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए। उनके साथ लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमान् आदि भी विमानपर जा बैठे। उस समय भगवान्‌के विरहके भयसे विभीषणके मनमें भी साथ जानेकी उत्कण्ठा हुई और उन्होंने अपने मन्त्रियोंके साथ श्रीरघुनाथजीका अनुसरण किया। इसके बाद लङ्का और अशोक-वाटिकापर दृष्टि डालते हुए भगवान् श्रीराम तुरंत ही अयोध्यापुरीकी ओर प्रस्थित हुए। साथ ही ब्रह्मा आदि देवता भी अपने-अपने विमानोंपर बैठकर यात्रा करने लगे। उस समय भगवान् श्रीराम कानोंको सुख पहुँचानेवाली देव-दुन्दुभियोंकी मधुर ध्वनि सुनते तथा मार्गमें सीताजीको अनेकों आश्रमोंसे युक्त तीर्थों, मुनियों, मुनि-पुत्रों तथा पतिव्रता मुनि-पत्नियोंका दर्शन कराते हुए चल रहे थे। परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने पहले लक्ष्मणके साथ जिन-जिन स्थानोंपर निवास किया था, वे सभी सीताजीको दिखाये। इस प्रकार उन्हें मार्गके स्थानोंका दर्शन कराते हुए श्रीरामचन्द्रजीने अपनी पुरी अयोध्याको देखा; फिर उसके निकट नन्दिग्रामपर दृष्टिपात किया, जहाँ भाईके वियोग-जनित अनेकों दुःखमय चिह्नोंको धारण करके धर्मका पालन करते हुए राजा भरत निवास कर रहे थे। उन दिनों वे जमीनमें गड्ढा खोदकर उसीमें सोया करते थे। ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक मस्तकपर जटा और शरीरमें वल्कल वस्त्र धारण किये रहते थे। उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चा करते हुए दुःखसे आतुर रहते थे। अन्नके नामपर तो वे जौ भी नहीं ग्रहण करते थे तथा पानी भी बारंबार नहीं पीते थे।

जब सूर्यदेवका उदय होता, तब वे उन्हें प्रणाम करके कहते—'जगत्‌को नेत्र प्रदान करनेवाले भगवान् सूर्य ! आप देवताओंके स्वामी हैं; मेरे महान् पापको हर लीजिये [हाय ! मुझसे बढ़कर पापी कौन होगा]। मेरे