पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 434, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंपातालखण्ड ] * देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका उन्हें वरदान तथा रामराज्यका वर्णन * ४१७
श्रीरामचन्द्रजीकी बात सुनकर माता कौसल्याने अपने पैरोंपर पड़ी हुई पतिव्रता बहू सीताको आशीर्वाद देते हुए कहा—'मानिनी सीते ! तुम चिरकालतक अपने पतिकी जीवन-सङ्गिनी बनी रहो। मेरी पवित्र स्वभाव-वाली बहू ! तुम दो पुत्रोंकी जननी होकर अपने इस कुलको पवित्र करो। बेटी ! दुःख-सुखमें पतिका साथ देनेवाली तुम्हारी-जैसी पतिव्रता स्त्रियाँ तीनों लोकोंमें कहीं भी दुःखकी भागिनी नहीं होतीं—यह सर्वथा सत्य है। विदेहकुमारी ! तुमने महात्मा रामके चरणकमलोंका अनुसरण करके अपने ही द्वारा अपने कुलको पवित्र कर दिया।' सुन्दर नेत्रोंवाली श्रीरघुनाथपत्नी सीतासे यों कहकर माता कौसल्या चुप हो गयीं। हर्षके कारण पुनः उनका सर्वाङ्ग पुलकित हो गया।
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीके भाई भरतने उन्हें पिताजीका दिया हुआ अपना महान् राज्य निवेदन कर दिया। इससे मन्त्रियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मन्त्रके जाननेवाले ज्योतिषियोंको बुलाकर राज्याभिषेकका मुहूर्त पूछा और उद्योग करके उनके बताये हुए उत्तम नक्षत्रसे युक्त अच्छे दिनको शुभ मुहूर्तमें बड़े हर्षके साथ राजा श्रीरामचन्द्रजीका अभिषेक कराया। सुन्दर व्याघ्रचर्मके ऊपर सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका नक्शा बनाकर राजाधिराज महाराज श्रीराम उसपर विराजमान हुए। उसी दिनसे साधु पुरुषोंके हृदयमें आनन्द छा गया। सभी स्त्रियाँ पतिके प्रति भक्ति रखती हुई पतिव्रत-धर्मके पालनमें संलग्न हो गयीं। संसारके मनुष्य कभी मनसे भी पापका आचरण नहीं करते थे। देवता, दैत्य, नाग, यक्ष, असुर तथा बड़े-बड़े सर्प—ये सभी न्यायमार्गपर स्थित होकर श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको शिरोधार्य करने लगे। सभी परोपकारमें लगे रहते थे। सबको अपने धर्मके अनुष्ठानमें ही सुख और संतोषकी प्राप्ति होती थी। विद्यासे ही सबका विनोद होता था। दिन-रात शुभ कर्मोंपर ही सबकी दृष्टि रहती थी। श्रीरामके राज्यमें चोरोंकी तो कहीं चर्चा ही नहीं थी। जोरसे चलनेवाली हवा भी राह चलते हुए पथिकोंके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्त्रको भी नहीं उड़ाती थी। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव बड़ा दयालु था। वे याचकोंके लिये कुबेर थे।
<center>★</center>देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका उन्हें वरदान देना तथा रामराज्यका वर्णन
शेषजी कहते हैं—मुने ! जब श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक हो गया तो राक्षसराज रावणके वधसे प्रसन्नचित्त हुए देवताओंने प्रणाम करके उनका इस प्रकार स्तवन किया।
देवता बोले—देवताओंकी पीड़ा दूर करनेवाले दशरथनन्दन श्रीराम ! आपकी जय हो। आपके द्वारा जो राक्षसराजका विनाश हुआ है, उस अद्भुत कथाका समस्त कविजन उत्कण्ठापूर्वक वर्णन करेंगे। भुवनेश्वर ! प्रलयकालमें आप सम्पूर्ण लोकोंकी परम्पराको लीलापूर्वक ग्रस लेते हैं। प्रभो ! आप जन्म और जरा आदिके दुःखोंसे सदा मुक्त हैं। प्रबल शक्तिसम्पन्न परमात्मन् ! आपकी जय हो, आप हमारा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये। धार्मिक पुरुषोंके कुलरूपी समुद्रमें प्रकट होनेवाले अजर-अमर और अच्युत परमेश्वर ! आपकी जय हो। भगवन् ! आप देवताओंसे श्रेष्ठ हैं। आपका नाम लेकर अनेकों प्राणी पवित्र हो गये; फिर जिन्होंने श्रेष्ठ द्विज-वंशमें जन्म ग्रहण करके उत्तम मानव-शरीरको प्राप्त किया है, उनका उद्धार होना कौन बड़ी बात है ? शिव और ब्रह्माजी भी जिनको मस्तक झुकाते हैं, जो पवित्र यव आदिके चिह्नोंसे सुशोभित तथा मनोवाञ्छित कामना एवं समृद्धि देनेवाले हैं, उन आपके चरणोंका हम निरन्तर अपने हृदयमें चिन्तन करते रहें, यही हमारी अभिलाषा है। आप कामदेवकी भी शोभाको तिरस्कृत करनेवाली मनोहर कान्ति धारण करते हैं। परमपावन दयामय ! यदि आप इस भूमण्डलको अभयदान न दें तो देवता कैसे सुखी हो सकते हैं ?