भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति, श्रीरामका उन्हें वरदान तथा रामराज्यका वर्णन * ४१९


कभी ईति<sup></sup> दिखायी देती और न शत्रुसे ही कोई भय होता। वृक्षोंमें सदा फल लगे रहते और पृथ्वीपर अधिक मात्रामें अनाजकी उपज होती थी। स्त्रियोंका जीवन पुत्र-पौत्र आदि परिवारसे सनाथ रहता था। उन्हें निरन्तर अपने प्रियतमका संयोगजनित सुख मिलते रहनेके कारण विरहका क्लेश नहीं भोगना पड़ता था। सब लोग सदा श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंकी कथा सुननेके लिये उत्सुक रहते थे। उनकी वाणी कभी परायी निन्दामें नहीं प्रवृत्त होती थी। उनके मनमें भी कभी पापका संकल्प नहीं होता था। सीतापति श्रीरामके मुखकी ओर निहारते समय लोगोंकी आँखें स्थिर हो जातीं—वे एकटक नेत्रोंसे उन्हें देखते रह जाते थे। सबका हृदय निरन्तर करुणासे भरा रहता था। सदा इष्ट (यज्ञ-यागादि) और आपूर्त (कुएँ खुदवाने, बगीचे लगवाने आदि) के अनुष्ठान करनेवाले लोगोंके द्वारा उस राज्यकी जड़ और मजबूत होती थी। समूचे राष्ट्रमें सदा हरी-भरी खेती लहराती रहती थी। जहाँ सुगमतापूर्वक यात्रा की जा सके, ऐसे क्षेत्रोंसे वह देश भरा हुआ था। उस राज्यका देश सुन्दर और प्रजा उत्तम थी। सब लोग स्वस्थ रहते थे। गौएँ अधिक थीं और घास-पातका अच्छा सुभीता था। स्थान-स्थानपर देव-मन्दिरोंकी श्रेणियाँ रामराज्यकी शोभा बढ़ाती थीं। उस राज्यमें सभी गाँव भरे-पूरे और धन-सम्पत्तिसे सुशोभित थे। वाटिकाओंमें सुन्दर-सुन्दर फूल शोभा पाते और वृक्षोंमें स्वादिष्ट फल लगते थे। कमलोंसे भरे हुए तालाब वहाँकी भूमिका सौन्दर्य बढ़ा रहे थे।

रामराज्यमें केवल नदी ही सदम्भा (उत्तम जलवाली) थी, वहाँकी जनता कहीं भी सदम्भा (दम्भ या पाखण्डसे युक्त) नहीं दिखायी देती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णोंके कुल (समुदाय) ही कुलीन (उत्तम कुलमें उत्पन्न) थे, उनके धन नहीं कुलीन थे (अर्थात् उनके धनका कुत्सित मार्गमें लय—उपयोग नहीं होता था)। उस राज्यकी स्त्रियोंमें ही विभ्रम (हाव-भाव या विलास) था; विद्वानोंमें कहीं विभ्रम (भ्रान्ति या भूल) का नाम भी नहीं था। वहाँकी नदियाँ ही कुटिल मार्गसे जाती थीं, प्रजा नहीं; अर्थात् प्रजामें कुटिलताका सर्वथा अभाव था। श्रीरामके राज्यमें केवल कृष्णपक्षकी रात्रि ही तम (अन्धकार) से युक्त थी, मनुष्योंमें तम (अज्ञान या दुःख) नहीं था। वहाँकी स्त्रियोंमें ही रजका संयोग देखा जाता था, धर्म-प्रधान मनुष्योंमें नहीं; अर्थात् मनुष्योंमें धर्मकी अधिकता होनेके कारण सत्त्वगुणका ही उद्रेक होता था [रजोगुणका नहीं]। धनसे वहाँके मनुष्य ही अनन्ध थे (मदान्ध होनेसे बचे थे); उनका भोजन अनन्ध (अन्नरहित) नहीं था। उस राज्यमें केवल रथ ही 'अ‍नय' (लोह-रहित) था; राजकर्मचारियोंमें 'अनय' (अन्याय) का भाव नहीं था। फरसे, फावड़े, चँवर तथा छत्रोंमें ही दण्ड (डंडा) देखा जाता था; अन्यत्र कहीं भी क्रोध या बन्धन-जनित दण्ड देखनेमें नहीं आता था। जलोंमें ही जड़ता (या जलत्व) की बात सुनी जाती थी; मनुष्योंमें नहीं। स्त्रीके मध्यभाग (कटि) में ही दुर्बलता (पतलापन) थी; अन्यत्र नहीं। वहाँ औषधियोंमें ही कुष्ठ (कूट या कूठ नामक दवा) का योग देखा जाता था, मनुष्योंमें कुष्ठ (कोढ़) का नाम भी नहीं था। रत्नोंमें ही वेध (छिद्र) होता था, मूर्तियोंके हाथोंमें ही शूल (त्रिशूल) रहता था, प्रजाके शरीरमें वेध या शूलका रोग नहीं था। रसानुभूतिके समय सात्त्विक भावके कारण ही शरीरमें कम्प होता था; भयके कारण कहीं किसीको कँपकँपी होती हो—ऐसी बात नहीं देखी जाती थी। राम-राज्यमें केवल हाथी ही मतवाले होते थे, मनुष्योंमें कोई मतवाला नहीं था। तरङ्गैं जलाशयोंमें ही उठती थीं, किसीके मनमें नहीं; क्योंकि सबका मन स्थिर था। दान (मद) का त्याग केवल हाथियोंमें ही दृष्टिगोचर होता था; राजाओंमें नहीं। काँटे ही तीखे होते थे, मनुष्योंका स्वभाव नहीं। केवल बाणोंका ही गुणोंसे वियोग होता था<sup></sup>


१ 'ईति' कई प्रकारकी होती है—अवृष्टि (सूखा पड़ना), अतिवृष्टि (अधिक वर्षाके कारण बाढ़ आना), खेतोंमें चूहोंका लगना, टिड्डियोंका उपद्रव, सुग्गोंसे हानि और राजासे वैर इत्यादि।
२- धनुषकी डोरीको गुण कहते हैं, छूटते समय बाणका उससे वियोग होता है।