भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका छोड़ा जाना, श्रीरामका उसकी रक्षाके लिये उपदेश करना * ४२७


हैं।* गृहस्थाश्रममें रहनेवाले पुरुषको अन्न, जल, दूध, मूल अथवा फल आदिके द्वारा अतिथिका सत्कार करना चाहिये। आया हुआ अतिथि सत्कार न पाकर जिसके घरसे निराश लौट जाता है, वह गृहस्थ जीवनभरके कमाये हुए पुण्यसे क्षणभरमें वंचित हो जाता है।† गृहस्थको उचित है कि वह बलिवैश्वदेव-कर्मके द्वारा देवताओं, पितरों तथा मनुष्योंको उनका भाग देकर शेष अन्नका भोजन करे, वही उसके लिये अमृत है। जो केवल अपना पेट भरनेवाला है—जो अपने ही लिये भोजन बनाता और खाता है, वह पापका ही भोजन करता है। तेलमें षष्ठी और अष्टमीको तथा मांसमें सदा ही पापका निवास है। चतुर्दशीको क्षौर-कर्म तथा अमावस्याको स्त्री-समागमका त्याग करना चाहिये।‡ रजस्वला-अवस्थामें स्त्रीके सम्पर्कसे दूर रहे। पत्नीके साथ भोजन न करे। एक वस्त्र पहनकर तथा चटाईके आसनपर बैठकर भोजन करना निषिद्ध है। अपनेमें तेजकी इच्छा रखनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको भोजन करती हुई स्त्रीकी ओर नहीं देखना चाहिये। मुँहसे आगको न फूँके, नंगी स्त्रीकी ओर दृष्टि न डाले। बछड़ेको दूध पिलाती हुई गौको न छेड़े। दूसरेको इन्द्र-धनुष न दिखाये। रातमें दही खाना सर्वथा निषिद्ध है। आगमें अपने पैर न सेंके, उसमें कोई अपवित्र वस्तु न डाले। किसी भी जीवकी हिंसा तथा दोनों संध्याओंके समय भोजन न करे। रात्रिको खूब पेट भरके भोजन करना उचित नहीं है। पुरुषको नाचने, गाने और बजानेमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिये। काँसेके बर्तनमें पैर धुलाना निषिद्ध है। दूसरेके पहने हुए कपड़े और जूते न धारण करे। फूटे अथवा दूसरेके जूठे किये हुए बर्तनमें भोजन न करे, भीगे पैर न सोये। हाथ और मुँहके जूठे रहते हुए कहीं न जाय। सोते-सोते न खाय। उच्छिष्ट-अवस्थामें मस्तकका स्पर्श न करे। दूसरोंके गुप्त भेद न खोले। इस प्रकार गृहस्थ-धर्मका समय पूरा करके वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे। उस समय इच्छा हो तो वैराग्यपूर्वक स्त्रीके साथ रहे, अथवा स्त्रीको साथ न रखकर उसे पुत्रोंके अधीन सौंप दे। वानप्रस्थ-धर्मका पूर्ण पालन करनेके पश्चात् विरक्त हो जाय—संन्यास ले ले।

वात्स्यायनजी ! उस समय महर्षियोंने उपर्युक्त प्रकारसे अनेकों धर्मोंका वर्णन किया तथा सम्पूर्ण जगत्के महान् हितैषी भगवान् श्रीरामने उन सबको ध्यानपूर्वक सुना।

यज्ञ-सम्बन्धी अश्वका छोड़ा जाना और श्रीरामका उसकी रक्षाके लिये शत्रुघ्नको उपदेश करना

शेषजी कहते हैं—मुने ! इस प्रकार भगवान् श्रीराम ऋषियोंके मुखसे कुछ कालतक धर्मकी व्याख्या सुनते रहे; इतनेमें वसन्तका समय उपस्थित हुआ जब कि महापुरुषोंके यज्ञ आदि शुभ कर्मोंका प्रारम्भ होता है। वह समय आया देख बुद्धिमान् महर्षि वसिष्ठने सम्पूर्ण जगत्के सम्राट् श्रीरामचन्द्रजीसे यथोचित वाणीमें कहा—'महाबाहु रघुनाथजी ! अब आपके लिये वह समय आ गया है, जब कि यज्ञके लिये निश्चित किये हुए अश्वकी भलीभाँति पूजा करके उसे पृथ्वीपर भ्रमण करनेके लिये छोड़ा जाय। इसके लिये सामग्री एकत्रित हो, अच्छे-अच्छे ब्राह्मण बुलाये जायें तथा स्वयं आप ही उन ब्राह्मणोंकी यथोचित पूजा करें। दीनों, अंधों और दुःखियोंका विधिवत् सत्कार करके उन्हें रहनेको स्थान दें और उनके मनमें जिस वस्तुके पानेकी इच्छा हो, वही


* वाणिज्यं नृपतेः सेवा वेदानध्ययनं तथा। कुविवाहः क्रियालोपः कुलपातनहेतवः ॥ (९।४९)
† अनर्चितोऽतिथिर्गेहाद् भग्नाशो यस्य गच्छति । आजन्मसञ्चितात् पुण्यात् क्षणात् स हि बहिर्भवेत् ॥ (९।५१)
‡ षष्ठ्यष्टम्योर्विशेत् पापं तैले मांसे सदैव हि। चतुर्दश्यां तथामायां त्यजेत क्षुरमङ्गनाम् ॥ (९।५३)