भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४३२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

अपनी माताकी ऐसी बात सुनकर शत्रुघ्नने उत्तर दिया—'माँ ! मैं अपने शरीरकी भाँति पुष्कलकी रक्षा करूँगा तथा जैसा मेरा नाम है उसके अनुसार शत्रुओंका नाश करके प्रसन्नतापूर्वक लौटूँगा। तुम्हारे इन युगल चरणोंका स्मरण करके मैं कल्याणका ही भागी होऊँगा।' ऐसा कहकर वीर शत्रुघ्न वहाँसे चल दिये तथा यज्ञ-मण्डपसे छोड़ा हुआ वह यज्ञका अश्व अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें प्रवीण सम्पूर्ण योद्धाओंद्वारा चारों ओरसे घिरकर सबसे पहले पूर्व दिशाकी ओर गया। उसका वेग वायुके समान था। जब वे चलनेको उद्यत हुए तो उनकी दाहिनी बाँह फड़क उठी और उन्हें कल्याण तथा विजयकी सूचना देने लगी। उधर पुष्कल अपने सुन्दर एवं समृद्धिशाली महलमें गये और वहाँ अपनी पतिव्रता पत्नीसे मिले, जो स्वामीके दर्शनके लिये उत्कण्ठित थी और उन्हें देखकर हर्षमें भर गयी थी। उससे मिलकर पुष्कलने कहा—'भद्रे ! मैं चाचा शत्रुघ्नका पृष्ठ-पोषक होकर रथपर सवार हो यज्ञके घोड़ेकी रक्षाके लिये जा रहा हूँ; इस कार्यके लिये मुझे श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा मिल चुकी है। तुम यहाँ रहकर मेरी समस्त माताओंका सत्कार करना तथा चरण दबाना आदि सभी प्रकारकी सेवाएँ करना। उनके प्रत्येक कार्यमें—उनकी आज्ञाका पालन करनेमें आदर एवं उत्साहके साथ प्रवृत्त होना। यहाँ लोपामुद्रा आदि जितनी पतिव्रता देवियाँ आयी हुई हैं, वे सभी अपने तपोबलसे सुशोभित एवं कल्याणमयी हैं; तुम्हारे द्वारा उनमेंसे किसीका अपमान न हो जाय, इसके लिये सदा सावधान रहना।'

शेषजी कहते हैं—पुष्कल जब इस प्रकार उपदेश दे चुके तो उनकी पतिव्रता पत्नी कान्तिमतीने पतिकी ओर प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखा तथा अत्यन्त विश्वस्त होकर मन्द-मन्द मुसकराती हुई वह गद्गद वाणीमें बोली—'नाथ ! संग्राममें आपकी सर्वत्र विजय हो, आपको चाचा शत्रुघ्नजीकी आज्ञाका सर्वथा पालन करना चाहिये तथा जिस प्रकार भी घोड़ेकी रक्षा हो उसके लिये सचेष्ट रहना चाहिये। स्वामिन् ! आप शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपने श्रेष्ठ कुलकी शोभा बढ़ाइये। महाबाहो ! जाइये, इस यात्रामें आपका कल्याण हो। यह है आपका धनुष, जो उत्तम गुण (सुदृढ़ प्रत्यञ्चा) से सुशोभित है; इसे शीघ्र ही हाथमें लीजिये, इसकी टङ्कार सुनकर आपके शत्रुओंका दल भयसे व्याकुल हो उठेगा। वीर ! ये आपके दोनों तरकश हैं; इन्हें बाँध लीजिये, जिससे युद्धमें आपको सुख मिले। इसमें वैरियॉंको टुकड़े-टुकड़े कर डालनेवाले अनेक बाण भरे हैं। प्राणनाथ ! कामदेवके समान सुन्दर अपने शरीरपर यह सुदृढ़ कवच धारण कीजिये, जो विद्युत्‌की प्रभाके समान अपने महान् प्रकाशसे अन्धकारको दूर किये देता है। प्रियतम अपने मस्तकपर यह शिरस्त्राण (मुकुट) भी पहन लीजिये, जो मनको लुभानेवाला है। साथ ही मणियों और रत्नोंसे विभूषित ये दो उज्ज्वल कुण्डल हैं, इन्हें कानोंमें धारण कीजिये।'

पुष्कलने कहा—प्रिये ! तुम जैसा कहती हो, वह सब मैं करूँगा। वीरपत्नी कान्तिमती ! तुम्हारी इच्छाके अनुसार मेरी उत्तम कीर्तिका विस्तार होगा।

ऐसा कहकर पराक्रमी वीर पुष्कलने कान्तिमतीके दिये हुए कवच, सुन्दर मुकुट, धनुष और विशाल