पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मणिके बने हुए महल तथा गोपुर (फाटक) उस नगरीकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँके मनुष्य सब प्रकारके भोग भोगनेवाले तथा सदाचारसे सुशोभित थे। वहाँ बाण सन्धान करनेमें चतुर वीर हाथोंमें धनुष लिये उस पुरीके श्रेष्ठ राजा सुमदको प्रसन्न किया करते थे। शत्रुघ्नने दूरसे ही उस नगरीको देखा। उसके पास ही एक उद्यान था, जो उस नगरमें सबसे श्रेष्ठ और शोभायमान दिखायी देता था। तमाल और ताल आदिके वृक्ष उसकी सुषमाको और भी बढ़ा रहे थे। यज्ञका घोड़ा उस उपवनके बीचमें घुस गया तथा उसके पीछे-पीछे वीर शत्रुघ्न भी, जिनके चरण-कमलोंकी सेवामें अनेकों धनुर्धर क्षत्रिय मौजूद थे, उसमें जा पहुँचे। वहाँ जानेपर उन्हें एक देव-मन्दिर दिखायी दिया, जिसकी रचना अद्भुत थी। वह कैलास-शिखरके समान ऊँचा तथा शोभासे सम्पन्न था। देवताओंके लिये भी वह सेव्य जान पड़ता था। उस सुन्दर देवालयको देखकर श्रीरघुनाथजीके भाई शत्रुघ्नने अपने सुमति नामक मन्त्रीसे, जो अच्छे वक्ता थे, पूछा।
शत्रुघ्न बोले— मन्त्रिवर ! बताओ, यह क्या है ? किस देवताका मन्दिर है ? किस देवताका यहाँ पूजन होता है तथा वे देवता किस हेतुसे यहाँ विराजमान हैं ?
मन्त्री सब बातोंके जानकार थे, उन्होंने शत्रुघ्नका प्रश्न सुनकर कहा—'वीरवर ! एकाग्रचित्त होकर सुनो, मैं सब बातोंका यथावत् वर्णन करता हूँ, इसे तुम कामाक्षा देवीका उत्तम स्थान समझो। यह जगत्को एकमात्र कल्याण प्रदान करनेवाला है। पूर्वकालमें अहिच्छत्रा नगरीके स्वामी राजा सुमदकी प्रार्थनासे भगवती कामाक्षा यहाँ विराजमान हुईं, जो भक्तोंका दुःख दूर करती हुई उनकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करती हैं। वीरशिरोमणि शत्रुघ्न ! तुम इन्हें प्रणाम करो।' मन्त्रीके वचन सुनकर शत्रुओंको ताप देनेवाले नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नने भगवती कामाक्षाको प्रणाम किया और उनके प्रकट होनेके सम्बन्धकी सब बातें पूछीं—'मन्त्रिवर ! अहिच्छत्राके स्वामी राजा सुमद कौन हैं ? उन्होंने कौन-सी तपस्या की है, जिसके प्रभावसे ये सम्पूर्ण लोकोंकी जननी कामाक्षा देवी सन्तुष्ट होकर यहाँ विराज रही हैं ?'
सुमतिने कहा— हेमकूट नामसे प्रसिद्ध एक पवित्र पर्वत है, जो सम्पूर्ण देवताओंसे सुशोभित रहा करता है। वहाँ ऋषि-मुनियोंसे सेवित विमल नामका एक तीर्थ है। वहीं राजा सुमदने तपस्या की थी। उनके राज्यकी सीमापर रहनेवाले सम्पूर्ण सामन्त नरेशोंने, जो वास्तवमें शत्रु थे, एक साथ मिलकर उनके राज्यपर चढ़ाई की। उस युद्धमें उनके पिता, माता तथा प्रजावर्गके लोग भी शत्रुओंके हाथसे मारे गये। तब सर्वथा असहाय होकर राजा सुमद तपस्याके लिये उपयोगी विमलतीर्थमें गये और वहाँ तीन वर्षतक एक पैरसे खड़ा हो मन-ही-मन जगदम्बाका ध्यान करते रहे। उस समय उनकी आँखें नासिकाके अग्रभागपर जमी रहती थीं। इसके बाद तीन वर्षोंतक उन्होंने सूखे पत्ते चबाकर अत्यन्त उग्र तपस्या की, जिसका अनुष्ठान दूसरेके लिये अत्यन्त कठिन था। तत्पश्चात् पुनः तीन वर्षोंतक उन्होंने और भी कठोर नियम धारण किये—जाड़ेके दिनोंमें वे पानीमें डूबे रहते, गर्मीमें पञ्चाग्निका सेवन करते तथा वर्षाकालमें बादलोंकी ओर मुँह किये मैदानमें खड़े रहते थे। तदनन्तर पुनः तीन वर्षोंतक वे धीर राजा अपने हृदयान्तर्वर्ती प्राणवायुको रोककर केवल भवानीके ध्यानमें संलग्न रहे। उस समय उन्हें जगदम्बाके सिवा दूसरा कुछ दिखलायी नहीं देता था। इस प्रकार जब बारहवाँ वर्ष व्यतीत हो गया, तो उनकी भारी तपस्या देखकर इन्द्रने मन-ही-मन उसपर विचार किया और भयके कारण वे उनसे डाह करने लगे। उन्होंने अप्सराओंके साथ कामदेवको, जो ब्रह्मा और इन्द्रको भी परास्त करनेके लिये उद्यत रहता था, परिवारसहित बुलाकर इस प्रकार आज्ञा दी—'सखे कामदेव ! तुम सबका मन मोहनेवाले हो, जाओ, मेरा एक प्रिय कार्य करो, जैसे भी हो सके राजा सुमदकी तपस्यामें विघ्न डालो।'
कामदेवने कहा— देवराज ! मुझ सेवकके रहते हुए आप चिन्ता न कीजिये, आर्य ! मैं अभी सुमदके