पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी। वे अपनी चार भुजाओंमें धनुष, बाण, अङ्कुश और पाश धारण किये हुए थीं। माताका दर्शन पाकर बुद्धिमान् राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बारम्बार मस्तक झुकाकर भक्तिभावनासे प्रकट हुई माता दुर्गाको प्रणाम किया। वे बारम्बार राजाके शरीरपर अपने कोमल हाथ फेरती हुई हँस रही थीं। महामति राजा सुमंदके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उनके अन्तःकरणकी वृत्ति भक्ति-भावसे उत्कण्ठित हो गयी और वे गद्गद स्वरसे माताकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'देवि! आपकी जय हो। महादेवि! भक्त-जन सदा आपकी ही सेवा करते हैं। ब्रह्मा और इन्द्र आदि समस्त देवता आपके युगल-चरणोंकी आराधनामें लगे रहते हैं। आप पापके स्पर्शसे रहित हैं। आपहीके प्रतापसे अग्निदेव प्राणियोंके भीतर और बाहर स्थित होकर सारे जगत्का कल्याण करते हैं। महादेवि! देवता और असुर—सभी आपके चरणोंमें नतमस्तक होते हैं। आप ही विद्या तथा आप ही भगवान् विष्णुकी महामाया हैं। एकमात्र आप ही इस जगत्को पवित्र करनेवाली हैं। आप ही अपनी शक्तिसे इस संसारकी सृष्टि और पालन करती हैं। जगत्के जीवोंको मोहमें डालनेवाली भी आप ही हैं। सब देवता आपहीसे सिद्धि पाकर सुखी होते हैं। मातः! आप दयाकी स्वामिनी, सबकी वन्दनीया तथा भक्तोंपर स्नेह रखनेवाली हैं। मेरा पालन कीजिये। मैं आपके चरण-कमलोंका सेवक हूँ। मेरी रक्षा कीजिये।'
सुमतिने कहा— इस प्रकार की हुई स्तुतिसे सन्तुष्ट होकर जगन्माता कामाक्षा अपने भक्त सुमंदसे, जिनका शरीर तपस्याके कारण दुर्बल हो रहा था, बोलीं—'बेटा! कोई उत्तम वर माँगो।' माताका यह वचन सुनकर राजा सुमंदको बड़ा हर्ष हुआ और उन्होंने अपना खोया हुआ अकण्टक राज्य, जगन्माता भवानीके चरणोंमें अविचल भक्ति तथा अन्तमें संसारसागरसे पार उतारनेवाली मुक्तिका वरदान माँगा।
कामाक्षाने कहा— सुमंद! तुम सर्वत्र अकण्टक राज्य प्राप्त करो और शत्रुओंके द्वारा तुम्हारी कभी पराजय न हो। जिस समय महायशस्वी श्रीरघुनाथजी रावणको मारकर सब सामग्रियोंसे सुशोभित अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेंगे, उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले उनके महावीर भ्राता शत्रुघ्न वीर आदिसे घिरकर घोड़ेकी रक्षा करते हुए यहाँ आयेंगे। तुम उन्हें अपना राज्य, समृद्धि और धन आदि सब कुछ सौंपकर उनके साथ पृथ्वीपर भ्रमण करोगे तथा अन्तमें ब्रह्मा, इन्द्र और शिव आदिसे सेवित भगवान् श्रीरामको प्रणाम करके ऐसी मुक्ति प्राप्त करोगे, जो यम-नियमोंका साधन करनेवाले योगियोंके लिये भी दुर्लभ है।
ऐसा कहकर देवता और असुरोंसे अभिवन्दित कामाक्षा देवी वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं तथा सुमंद भी अपने शत्रुओंको मारकर अहिच्छत्रा नगरीके राजा हुए। वही ये इस नगरीके स्वामी राजा सुमंद हैं। यद्यपि ये सब प्रकारसे समर्थ तथा बल और वाहनोंसे सम्पन्न हैं तथापि तुम्हारे यज्ञ-सम्बन्धी घोड़ेको नहीं पकड़ेंगे; क्योंकि महामायाने इस बातके लिये इनको भलीभाँति शिक्षा दी है।
शेषजी कहते हैं— सुमतिके मुखसे राजा सुमंदका यह वृत्तान्त सुनकर महान् यशस्वी, बुद्धिमान् और बलवान् शत्रुघ्नजी बड़े प्रसन्न हुए तथा 'साधु-साधु' कहकर उन्होंने अपना हर्ष प्रकट किया। उधर अहिच्छत्राके स्वामी अपने सेवकगणोंसे घिरकर सुखपूर्वक राजसभामें विराजमान थे। वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा धन-धान्यसे सम्पन्न वैश्य भी उनके पास बैठे थे; इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। इसी समय किसीने आकर राजासे कहा—'स्वामिन्! न जाने किसका घोड़ा नगरके पास आया है, जिसके ललाटमें पत्र बँधा हुआ है।' यह सुनकर राजाने तुरंत ही एक अच्छे सेवकको भेजा और कहा—'जाकर पता लगाओ, किस राजाका घोड़ा मेरे नगरके निकट आया है।' सेवकने जाकर सब बातका पता लगाया और महान् क्षत्रियोंसे सेवित राजा सुमंदके पास आ आरम्भसे ही सारा वृत्तान्त कह सुनाया। 'श्रीरघुनाथजीका घोड़ा है' यह सुनकर बुद्धिमान् राजाको चिरकालकी पुरानी बातका स्मरण हो आया