भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * राजा रत्नग्रीवका भगवान्‌का दर्शन करके रानी आदिके साथ वैकुण्ठको जाना * ४५७


जो आनन्द मिला, उसका ब्रह्माजी भी अनुभव नहीं कर सकते। दुन्दुभी बजने लगी तथा वीणा, पणव और गोमुख आदि बाजे भी बज उठे। महाराज रत्नग्रीवके मनमें उस समय बड़ा उल्लास छा गया था। वे प्रतिक्षण भगवान्‌का गुणगान करते हुए, नाचते, खड़े होते, हँसते, बोलते और बात करते थे। उन्हें सब सन्तापोंका नाश करनेवाले घनीभूत आनन्दकी प्राप्ति हुई थी। तदनन्तर सारा दिन भगवान्‌के कीर्तन और स्मरणमें बिताकर राजा रत्नग्रीव रातमें गङ्गाजीके तटपर, जो महान् फल प्रदान करनेवाला है, सो रहे। सपनेमें उन्होंने देखा, 'मेरा स्वरूप चतुर्भुज हो गया है। मैं शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और शार्ङ्ग-धनुष धारण किये हुए हूँ तथा भगवान् पुरुषोत्तमके सामने रुद्र आदि देवताओंके साथ नृत्य कर रहा हूँ।'

उन्हें यह भी दिखायी दिया कि शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म आदि आयुध तथा विष्वक्सेन आदि पार्षदगण परम सुन्दर दिव्य स्वरूपसे प्रकट हो सदा श्रीलक्ष्मीपतिकी उपासनामें संलग्न रहते हैं। यह सब देखकर उन्हें अद्भुत हर्ष और आश्चर्य हुआ। अपनी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण करनेवाले भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन पाकर महाबुद्धिमान् राजाने अपनेको उनका कृपापात्र माना। स्वप्नमें ये सारी बातें देखकर जब वे प्रातःकाल नींदसे उठे तो तपस्वी ब्राह्मणको बुलाकर उन्होंने अपने देखे हुए सपनेका सारा समाचार उनसे कह सुनाया। उसे सुनकर बुद्धिमान् ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ, उन्होंने कहा—'राजन् ! तुमने जिन भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन किया है, वे तुम्हें अपना शङ्ख, चक्र आदि चिह्नोंसे विभूषित स्वरूप प्रदान करना चाहते हैं।' यह सुनकर महामना रत्नग्रीवने दीन-दुःखियोंको उनकी इच्छाके अनुसार दान दिलाया। फिर गङ्गासागर-सङ्गममें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया तथा भगवान्‌के गुणोंका गान करते हुए वे उनके दर्शनकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर, जब दोपहरका समय हुआ तो आकाशमें बारंबार दुन्दुभियाँ बजने लगीं। देवताओंके हाथसे बजाये जानेके कारण उनसे बड़े जोरकी आवाज होती थी। सहसा राजाके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा हुई। देवता कहने लगे—'नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो ! नीलाचलका प्रत्यक्ष दर्शन करो।' देवताओंकी कही हुई यह बात ज्यों ही राजाके कानोंमें पड़ी, त्यों ही नीलगिरिके नामसे प्रसिद्ध वह महान् पर्वत उनकी आँखोंके समक्ष प्रकट हो गया। करोड़ों सूर्योंके समान उसका प्रकाश छा रहा था। चारों ओरसे सोने और चाँदीके शिखर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। राजा सोचने लगे—क्या यह अग्नि प्रज्वलित हो रहा है या दूसरे सूर्यका उदय हुआ है? अथवा स्थिर कान्ति धारण करनेवाला विद्युतपुञ्ज ही सहसा सामने प्रकट हो गया है?'

तपस्वी ब्राह्मणने अत्यन्त शोभासम्पन्न नीलगिरिको देखकर राजासे कहा—'महाराज ! यही वह परम पवित्र महान् पर्वत है।' यह सुनकर नृपश्रेष्ठ रत्नग्रीवने मस्तक झुकाकर उसे प्रणाम किया और कहा—'मैं धन्य और कृतकृत्य हो गया; क्योंकि इस समय मुझे नीलाचलका प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा है। राजमन्त्री, रानी और करम्ब नामका जुलाहा—ये भी नीलाचलका दर्शन पाकर बड़े प्रसन्न हुए। नरश्रेष्ठ ! उपर्युक्त पाँचों व्यक्तियोंने