भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 1018 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

४६६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


पुष्कलके द्वारा चित्राङ्गका वध, हनुमान्‌जीके चरण-प्रहारसे सुबाहुका शापोद्धार तथा उनका आत्मसमर्पण

शेषजी कहते हैं—मुने! राजकुमार चित्राङ्ग क्रौञ्चव्यूहके कण्ठभागमें रथपर विराजमान था। अनेकों वीरोंसे घिरे हुए होनेके कारण उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। वाराहावतारधारी भगवान् विष्णुने जिस प्रकार समुद्रमें प्रवेश किया था, उसी प्रकार उसने भी शत्रुघ्नकी सेनामें प्रवेश किया। उसका धनुष अत्यन्त सुदृढ़ और मेघ-गर्जनाके समान टङ्कार करनेवाला था। चित्राङ्गने उसे खींचकर चढ़ाया और करोड़ों शत्रुओंको भस्म करनेवाले तीखे बाणोंका प्रहार आरम्भ किया। उन बाणोंसे समस्त शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण बहुत-से योद्धा धराशायी हो गये। इस प्रकार घोर संग्राम आरम्भ हो जानेपर पुष्कल भी युद्धके लिये गये। चित्राङ्ग और पुष्कल दोनों एक-दूसरेसे भिड़ गये। उस समय उन दोनोंका स्वरूप बड़ा ही मनोहर दिखायी देता था। पुष्कलने सुन्दर भ्रामकास्त्रका प्रयोग करके चित्राङ्गके दिव्य रथको आकाशमें घुमाना आरम्भ किया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। एक मुहूर्ततक आकाशमें चक्कर लगानेके बाद घोड़ोंसहित वह रथ बड़े कष्टसे स्थिर हुआ और युद्धभूमिमें आकर ठहरा। उस समय चित्राङ्गने कहा—'पुष्कल ! तुमने बड़ा उत्तम पराक्रम दिखाया। श्रेष्ठ योद्धा संग्राममें ऐसे कर्मोंकी बड़ी सराहना करते हैं। तुम घोड़ोंसहित मेरे रथको आकाशमें घुमाते रह गये! किन्तु अब मेरा भी पराक्रम देखो, जिसकी शूरवीर प्रशंसा करते हैं।' ऐसा कहकर चित्राङ्गने युद्धमें बड़े भयङ्कर अस्त्रका प्रयोग किया। उस बाणसे आबद्ध होकर पुष्कलका रथ आकाशमें पक्षीकी भाँति घोड़े और सारथिसहित चक्कर लगाने लगा। पुत्रका यह पराक्रम देखकर राजा सुबाहुको बड़ा विस्मय हुआ।

शत्रुवीरोंका दमन करनेवाले पुष्कल जब किसी तरह धरतीपर आकर ठहरे तो उन्होंने घोड़े और सारथिसहित चित्राङ्गके रथको अपने बाणोंसे नष्ट कर दिया। जब वह रथ टूट गया तो वीर चित्राङ्ग पुनः दूसरे रथपर सवार हुआ; परन्तु पुष्कलने लगे हाथ उसे भी अपने बाणोंसे नष्ट कर डाला। इस प्रकार उस युद्धके मैदानमें वीर पुष्कलने राजकुमार चित्राङ्गके दस रथ चौपट कर दिये। तब चित्राङ्ग एक विचित्र रथपर सवार होकर पुष्कलके साथ युद्ध करनेके लिये बड़े वेगसे आया। उसने क्रोधमें भरकर पाँच भल्ल हाथमें लिये और महातेजस्वी भरत-पुत्रके मस्तकको उनका निशाना बनाया। उन भल्लोंकी चोट खाकर पुष्कल क्रोधसे जल उठे और धनुषपर बाणका सन्धान करके चित्राङ्गको मार डालनेकी प्रतिज्ञा करते हुए बोले—'चित्राङ्ग ! यदि इस बाणसे मैं तुम्हारे प्राण न ले लूँ तो शील और सदाचारसे शोभा पानेवाली सती नारीको कलङ्कित करनेसे यमराजके वशमें पड़े हुए पापी मनुष्योंको जिस लोककी प्राप्ति होती है, वही मुझे भी मिले ! मेरी यह प्रतिज्ञा सत्य हो।' पुष्कलका यह उत्तम वचन सुनकर शत्रुपक्षके वीरोंका नाश करनेवाला बुद्धिमान् वीर चित्राङ्ग हँसकर बोला—'शूरशिरोमणे ! प्राणियोंकी मृत्यु सदा और सर्वत्र ही हो सकती है; अतः मुझे अपने मरनेका दुःख नहीं है; किन्तु तुम मेरे वधके लिये जो बाण छोड़ोगे, उसे मैं यदि काट न डालूँ तो उस अवस्थामें मेरी प्रतिज्ञा सुनो—जो मनुष्य तीर्थ-यात्राकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका मानसिक उत्साह नष्ट करता है, उसको लगनेवाला पाप मुझे भी लगे; क्योंकि उस दशामें मैं प्रतिज्ञा-भङ्गका अपराधी समझा जाऊँगा।' इतना कहकर चित्राङ्ग चुप हो गया। उसने अपने धनुषको सँभाला।

तब पुष्कल बोले—'यदि मैंने निष्कपट भावसे श्रीरामचन्द्रजीके युगल चरणोंकी उपासना की हो तो मेरी बात सच्ची हो जाय। यदि मैं अपनी स्त्रीके सिवा दूसरी किसी स्त्रीका मनमें भी विचार न करता होऊँ तो इस सत्यके प्रभावसे युद्धमें मेरा वचन सत्य हो।' यह कहकर पुष्कलने तुरंत ही अपने धनुषपर एक बाण चढ़ाया, जो कालाग्निके समान तेजस्वी तथा वीरोंके

पद्म पुराण · पृष्ठ 483, कुल 1018 में से · BharatKosha