पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
देवपुरके राजकुमार रुक्माङ्गदद्वारा अश्वका अपहरण, दोनों ओरकी सेनाओंमें युद्ध और पुष्कलके बाणसे राजा वीरमणिका मूर्छित होना
वात्स्यायन बोले— फणीश्वर ! जो भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेके लिये नाना प्रकारकी कीर्ति किया करते हैं, उन श्रीरघुनाथजीकी कथा सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती—अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है। वेदोंको धारण करनेवाले आरण्यक मुनि धन्य थे, जिन्होंने श्रीरघुनाथजीका दर्शन करके उनके सामने ही अपने नश्वर शरीरका परित्याग किया था। शेषजी ! अब यह बताइये कि महाराजका वह यज्ञ-सम्बन्धी अश्व वहाँसे किस ओर गया, किसने उसे पकड़ा तथा वहाँ रमानाथ श्रीरघुनाथजीकी कीर्तिका किस प्रकार विस्तार हुआ ?
शेषजीने कहा— ब्रह्मर्षे ! आपका प्रश्न बड़ा सुन्दर है। आप श्रीरघुनाथजीके सुने हुए गुणोंको भी नहीं सुने हुएके समान मानकर उनके प्रति अपना लोभ प्रकट करते हैं और बारम्बार उन्हें पूछते हैं। अच्छा, अब आगेकी कथा सुनिये। बहुततेरे सैनिकोंसे घिरा हुआ वह घोड़ा आरण्यक मुनिके आश्रमसे बाहर निकला और नर्मदाके मनोहर तटपर भ्रमण करता हुआ देवनिर्मित देवपुर नामक नगरमें जा पहुँचा। जहाँ मनुष्योंके घरोंकी दीवारें स्फटिक मणिकी बनी हुई थीं तथा वे गृह अपनी ऊँचाईके कारण हाथियोंसे भरे हुए विन्ध्याचल पर्वतका उपहास करते थे। वहाँकी प्रजाके घर भी चाँदीके बने हुए दिखायी देते थे तथा उनके गोपुर नाना प्रकारके माणिक्योंद्वारा बने हुए थे; जिनमें भाँति-भाँतिकी विचित्र मणियाँ जड़ी हुई थीं। उस नगरमें महाराज वीरमणि राज्य करते थे, जो धर्मात्माओंमें अग्रगण्य थे। उनका विशाल राज्य सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न था। राजाके पुत्रका नाम था रुक्माङ्गद। वह महान् शूरवीर और बलवान् था। एक दिन वह सुन्दर शरीरवाली रमणियोंके साथ विहार करनेके लिये वनमें गया और वहाँ प्रसन्नचित्त होकर मधुर वाणीमें मनोहर गान करता हुआ विचरने लगा। इसी समय परम बुद्धिमान् राजाधिराज श्रीरामचन्द्रजीका वह शोभाशाली अश्व उस वनमें आ पहुँचा। उसके ललाटमें स्वर्णपत्र बँधा हुआ था। शरीरका रंग गङ्गाजलके समान स्वच्छ था। परन्तु केसर और कुङ्कुमसे चर्चित होनेके कारण कुछ पीला दिखायी देता था। वह अपनी तीव्र गतिसे वायुके वेगको भी तिरस्कृत कर रहा था। उसका स्वरूप अत्यन्त कौतूहलसे भरा हुआ था। उसे देखकर राजकुमारकी स्त्रियोंने कहा—'प्रियतम ! स्वर्णपत्रसे शोभा पानेवाला यह महान् अश्व किसका है ? यह देखनेमें बड़ा सुन्दर है। आप इसे बलपूर्वक पकड़ लें।'
राजकुमारके नेत्र लीलायुक्त चितवनके कारण बड़े सुन्दर जान पड़ते थे। उसने स्त्रियोंकी बातें सुनकर खेल-सा करते हुए एक ही हाथसे घोड़ेको पकड़ लिया। उसके भालपत्रपर स्पष्ट अक्षर लिखे हुए थे। राजकुमार उसे बाँचकर हँसा और उस महिला-मण्डलमें इस प्रकार बोला—'अहो ! शौर्य और सम्पत्तिमें मेरे पिता महाराज वीरमणिकी समानता करनेवाला इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है, तथापि उनके जीते-जी ये राजा रामचन्द्र इतना अहङ्कार कैसे धारण करते हैं ? पिनाकधारी भगवान् शङ्कर जिनकी सदा रक्षा करते रहते हैं तथा देवता, दानव और यक्ष—अपने मणिमय मुकुटोंद्वारा जिनके चरणोंकी वन्दना किया करते हैं, वे महाबली मेरे पिताजी ही इस घोड़ेके द्वारा अश्वमेध यज्ञ करें। इस समय यह घुड़सालमें जाय और मेरे सैनिक इसे ले जाकर वहाँ बाँध दें।' इस प्रकार उस घोड़ेको पकड़कर राजा वीरमणिका ज्येष्ठ पुत्र रुक्माङ्गद अपनी पत्नियोंके साथ नगरमें आया। उस समय उसके मनमें बड़ा उत्साह भरा हुआ था। उसने पितासे जाकर कहा—'मैं रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रका घोड़ा ले आया हूँ। यह इच्छानुसार चलनेवाला अद्भुत अश्व अश्वमेध यज्ञके लिये छोड़ा गया था। रामके भाई शत्रुघ्न अपनी विशाल सेनाके साथ इसकी रक्षाके लिये आये हैं।' महाराज वीरमणि बड़े