भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 1018 में से

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पृष्ठ 513

४९६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण'


उन्हें आया देख समस्त वैरी भी साधु-साधु कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे तथा सबने उन्हें एक अद्भुत शक्तिशाली वीर माना। हनुमान्‌जी बड़ी प्रसन्नताके साथ मरे हुए वीर पुष्कलके पास आये और महापुरुषोंके भी आदरणीय मन्त्रिवर सुमतिको बुलाकर बोले—'आज मैं युद्धमें मरे हुए सम्पूर्ण वीरोंको जिलाऊँगा।'

ऐसा कहकर उन्होंने पुष्कलके विशाल वक्षःस्थल-पर औषध रखा और उनके सिरको धड़से जोड़कर यह कल्याणमय वचन कहा—'यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा श्रीरघुनाथजीको ही अपना स्वामी समझता हूँ तो इस दवासे पुष्कल शीघ्र ही जीवित हो जायें।' इस बातको ज्यों ही उन्होंने मुँहसे निकाला त्यों ही वीरशिरोमणि पुष्कल उठकर खड़े हो गये और रणभूमिमें रोषके मारे दाँत कटकटाने लगे। वे बोले—'मुझे युद्धमें मूर्च्छित करके वीरभद्र कहाँ चले गये ? मैं अभी उन्हें मार गिराता हूँ। कहाँ है मेरा उत्तम धनुष !' उन्हें ऐसा कहते देख कपिराज हनुमान्‌जीने कहा—'वीरवर ! तुम्हें वीरभद्रने मार डाला था। श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे पुनः नया जीवन प्राप्त हुआ है। शत्रुघ्न भी मूर्च्छित हो गये हैं। चलो, उनके पास चलें।' यों कहकर वे युद्धके मुहानेपर पहुँचे, जहाँ भगवान् श्रीशिवके बाणोंसे पीड़ित होकर शत्रुघ्नजी केवल साँस ले रहे थे। साँस आनेपर हनुमान्‌जीने उनकी छातीपर दवा रख दी और कहा—'भैया शत्रुघ्न ! तुम तो महाबलवान् और पराक्रमी हो, रणभूमिमें मूर्च्छित होकर कैसे पड़े हो ? यदि मैंने प्रयत्नपूर्वक आजन्म ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया है तो वीर शत्रुघ्न क्षणभरमें जीवित हो उठें।' इतना कहते ही वे क्षणमात्रमें जीवित हो बोल उठे—'शिव कहाँ हैं, शिव कहाँ हैं ? वे रणभूमि छोड़कर कहाँ चले गये ?'

पिनाकधारी रुद्रने युद्धमें अनेकों वीरोंका सफाया कर डाला था, किन्तु महात्मा हनुमान्‌जीने उन सबको जीवित कर दिया। तब वे सभी वीर कवच आदिसे सुसज्जित हो अपने-अपने रथपर बैठकर रोषपूर्ण हृदयसे शत्रुओंकी ओर चले। अबकी बार राजा वीरमणि स्वयं ही शत्रुघ्नका सामना करनेके लिये गये। उन्हें देखकर शत्रुघ्नको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने राजाके ऊपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया, जिससे उनकी सेना दग्ध होने लगी। शत्रुके छोड़े हुए उस महान् दाहक अस्त्रको देखकर राजाके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने वारुणास्त्रका प्रयोग किया। वारुणास्त्रद्वारा अपनी सेनाको शीतके कष्टसे पीड़ित देख महाबली शत्रुघ्नने उसपर वायव्यास्त्रका प्रहार किया। इससे बड़े जोरोंकी हवा चलने लगी। वायुके वेगसे मेघोंकी घिरी हुई घटा छिन्न-भिन्न हो गयी। वे चारों ओर फैलकर विलीन हो गये। अब शत्रुघ्नके सैनिक सुखी दिखायी देने लगे। उधर महाराज वीरमणिने जब देखा कि मेरी सेना आँधीसे कष्ट पा रही है, तब उन्होंने अपने धनुषपर शत्रुओंका संहार करनेवाले पर्वतास्त्रका प्रयोग किया। पर्वतोंके द्वारा वायुकी गति रुक गयी। अब वह युद्धक्षेत्रमें फैल नहीं पाती थी। यह देख शत्रुघ्नने वज्रास्त्रका सन्धान किया। वज्रास्त्रकी मार पड़नेपर समस्त पर्वत तिल-तिल करके चूर्ण हो गये। शत्रुवीरोंके अङ्ग विदीर्ण होने लगे। खूनसे लथपथ होनेके कारण उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस समय युद्धका अद्भुत दृश्य था। राजा वीरमणिका क्रोध सीमाको पार कर गया। उन्होंने अपने धनुषपर ब्रह्मास्त्रका सन्धान किया, जो वैरियाँको दग्ध करनेवाला अद्भुत अस्त्र था। ब्रह्मास्त्र उनके हाथसे छूटकर शत्रु की ओर चला। तबतक शत्रुघ्नने भी मोहनास्त्र छोड़ा। मोहनास्त्रने एक ही क्षणमें ब्रह्मास्त्रके दो टुकड़े कर डाले तथा राजाकी छातीमें चोट करके उन्हें तुरंत मूर्च्छित कर दिया। तब शिवजीको बड़ा क्रोध हुआ और वे रथपर बैठकर राजाके पास आये। उस समय शत्रुघ्न सहसा उनसे युद्धके लिये आगे बढ़ आये और अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर युद्ध करने लगे। उन दोनोंमें बड़ा भयङ्कर संग्राम छिड़ा, जो वैरियाँको विदीर्ण करनेवाला था। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग होनेके कारण सारी दिशाएँ उद्दीप्त हो उठी थीं। शिवके साथ युद्ध करते-करते शत्रुघ्न अत्यन्त व्याकुल हो गये। तब हनुमान्‌जीके उपदेशसे उन्होंने अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया—'हा नाथ ! हा भाई ! ये

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