पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 527, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें५१० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
शत्रुपक्षके सभी प्रधान वीरोंको रथपर बिठाकर अपने नगरमें ले गये। वहाँ जाकर वे राज-सभामें बैठे और बँधे हुए हनुमान्जीसे बोले—'पवनकुमार ! अब तुम भक्तोंकी रक्षा करनेवाले परमदयालु श्रीरघुनाथजीका स्मरण करो, जिससे सन्तुष्ट होकर वे तुम्हें तत्काल इस बन्धनसे मुक्त कर दें।' उनका कथन सुनकर हनुमान्जीने अपनेसहित समस्त वीरोंको बँधा देख रघुकुलमें अवतीर्ण, कमलके समान नेत्रोंवाले, परमदयालु सीतापत्ति श्रीरामचन्द्रजीका सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे स्मरण किया। वे मन-ही-मन कहने लगे—'हा नाथ ! हा पुरुषोत्तम !! हा दयालु सीतापते !!! [आप कहाँ हैं? मेरी दशापर दृष्टिपात करें] प्रभो ! आपका मुख स्वभावसे ही शोभासम्पन्न है, उसपर भी सुन्दर कुण्डलोंके कारण तो उसकी सुषमा और भी बढ़ गयी है। आप भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। मनोहर रूप धारण करते हैं। दयामय ! मुझे इस बन्धनसे शीघ्र मुक्त कीजिये; देर न लगाइये। आपने गजराज आदि भक्तोंको संकटसे बचाया है, दानव-वंशनरूपी अग्निकी ज्वालामें जलते हुए देवताओंकी रक्षा की है तथा दानवोंको मारकर उनकी पत्नियोंके मस्तककी केश-राशिको भी बन्धनसे मुक्त किया है [वे विधवा होनेके कारण कभी केश नहीं बाँधतीं]; करुणानिधे ! अब मेरी भी सुध लीजिये। नाथ ! बड़े-बड़े सम्राट् भी आपके चरणोंका पूजन करते हैं, इस समय आप यज्ञकर्ममें लगे हैं, मुनीश्वरोंके साथ धर्मका विचार कर रहे हैं और यहाँ मैं सुरथके द्वारा गाढ बन्धनमें बाँधा गया हूँ। महापुरुष ! देव ! शीघ्र आकर मुझे छुटकारा दीजिये। प्रभो ! सम्पूर्ण देवेश्वर भी आपके चरण-कमलोंकी अर्चना करते हैं। यदि इतने स्मरणके बाद भी आप हमलोगोंको इस बन्धनसे मुक्त नहीं करेंगे तो संसार खुश हो-होकर आपकी हँसी उड़ायेगा; इसलिये अब आप विलम्ब न कीजिये, हमें शीघ्र छुड़ाइये।'*
जगतके स्वामी कृपानिधान श्रीरघुवीरजीने हनुमान्जीकी प्रार्थना सुनी और अपने भक्तको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये वे तीव्रगामी पुष्पक विमानपर चढ़कर तुरंत चल दिये। हनुमान्जीने देखा, भगवान् आ गये। उनके पीछे लक्ष्मण और भरत हैं तथा साथमें मुनियोंका समुदाय शोभा पा रहा है। अपने स्वामीको आया देख हनुमान्जीने सुरथसे कहा—'राजन् ! देखो, भगवान् दया करके अपने भक्तको छुड़ानेके लिये आ गये। पूर्वकालमें जिस प्रकार इन्होंने स्मरण करनेमात्रसे पहुँचकर अनेक भक्तोंको संकटसे मुक्त किया है, उसी प्रकार आज बन्धनमें पड़े हुए मुझको भी छुड़ानेके लिये मेरे प्रभु आ पहुँचे।'
श्रीरामचन्द्रजी एक ही क्षणमें यहाँ आ पहुँचे, यह देखकर राजा सुरथ प्रेममग्न हो गये और उन्होंने भगवान्को सैकड़ों बार प्रणाम किया। श्रीरामने भी चतुर्भुज रूप धारणकर अपने भक्त सुरथको भुजाओंमें
* इत्युक्तमाकर्ण्य समीरजस्तदा सुबद्धमात्मानमवेक्ष्य वीरान्। संमूर्च्छिताञ्शत्रुशराविघातपीडायुतान् बन्धनमुक्तयेऽस्मरत् ॥
श्रीरामचन्द्रं रघुवंशजातं सीतापत्तिं पङ्कजपत्रनेत्रम्। स्वमुक्तये बन्धनतः कृपालुं सस्मार सर्वैः करणैर्विशोकैः ॥
हनुमानुवाच—
हा नाथ हा नरवरोत्तम हा दयालो सीतापते रुचिरकुण्डलशोभिवक्त्र।
भक्तार्तिदाहक मनोहररूपधारिन् मां बन्धनात् सपदि मोचय मा विलम्बम् ॥
संमोचितास्तु भवता गजपुङ्गवाद्या देवाश्च दानवकुलाग्निसुदह्यमानाः।
तत्सुन्दरीशिरसि संस्थितकेशबन्धसंमोचितासि करुणालय मां स्मरस्व ॥
त्वं यागकर्मनिरतोऽसि मुनीश्वरैर्द्धर्मं विचारयसि भूमिपतीड्यपाद।
अत्राहमद्य सुरथेन विगाढपाशबद्धोऽस्मि मोचय महापुरुषाशु देव ॥
नो मोचयस्यथ यदि स्मरणातिरेकात्त्वं सर्वदेववरपूजितपादपद्म।
लोको भवन्तमित्थमुल्लसितो हसिष्यत्तस्माद् विलम्बमिह मा चर मोचयाशु ॥
(५३। १२—१७)