पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातालखण्ड ] * सीताजीके त्यागकी बातसे शत्रुघ्नकी मूर्च्छा; वाल्मीकिके आश्रमपर लव-कुशका जन्म * ५२३
तपस्विनियोंके दर्शनकी इच्छासे यात्रा करना चाहती हूँ, फिर ये दुःख देनेवाले अपशकुन कैसे हो रहे हैं ! श्रीरामका, भरतका तथा तुम्हारे छोटे भाई शत्रुघ्नका कल्याण हो, उनकी प्रजामें सर्वत्र शान्ति रहे, कहीं कोई विप्लव या उपद्रव न हो।'
जानकीजीको ऐसी बातें करते देख लक्ष्मण कुछ बोल न सके, आँसुओंसे उनका गला भर आया। इसी प्रकार आगे जाकर सीताजीने फिर देखा, बहुत-से मृग बायीं ओरसे घूमकर निकले जा रहे हैं। वे भारी दुःखकी सूचना देनेवाले थे। उन्हें देखकर जानकीजी कहने लगीं— 'आज ये मृग जो मेरी बायीं ओरसे निकल रहे हैं, सो ठीक ही है; श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको छोड़कर अन्यत्र जानेवाली सीताके लिये ऐसा होना उचित ही है। नारियोंका सबसे बड़ा धर्म है— अपने स्वामीके चरणोंका पूजन, उसीको छोड़कर मैं अन्यत्र जा रही हूँ; अतः मेरे लिये जो दण्ड मिले, उचित ही है।' इस प्रकार मार्गमें पारमार्थिक विचार करती हुई देवी जानकीने गङ्गाजीको देखा, जिनके तटपर मुनियोंका समुदाय निवास करता है। जिनके जलकणोंका स्पर्श होते ही राशि-राशि महापातक पलायन कर जाते हैं— उन्हें वहाँ चारों ओर अपने रहने योग्य कोई स्थान नहीं दिखायी देता। गङ्गाके किनारे पहुँचकर लक्ष्मणजीने रथपर बैठी हुई सीताजीसे आँसू बहाते हुए कहा— 'भाभी ! चलो, लहरोंसे भरी हुई गङ्गाको पार करो।' सीताजी देवरकी बात सुनकर तुरंत रथसे उतर गयीं।
तदनन्तर, नावसे गङ्गाके पार होकर लक्ष्मणजी जानकीजीको साथ लिये वनमें चले। वे श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करनेमें कुशल थे; अतः सीताको अत्यन्त भयंकर एवं दुःखदायी जंगलमें ले गये— जहाँ बबूल, खैरा और धव आदिके महाभयानक वृक्ष थे, जो दावानलसे दग्ध होनेके कारण सूख गये थे। ऐसा जंगल देखकर सीता भयके कारण बहुत चिन्तित हुईं। काँटोंसे उनके कोमल चरणोंमें घाव हो गये। वे लक्ष्मणसे बोलीं— 'वीरवर ! यहाँ अच्छे-अच्छे ऋषि-मुनियोंके रहने योग्य आश्रम मुझे नहीं दिखायी देते, जो नेत्रोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं तथा महर्षियोंकी तपस्विनी स्त्रियोंके भी दर्शन नहीं होते। यहाँ तो केवल भयंकर पक्षी, सूखे वृक्ष और दावानलसे सब ओर जलता हुआ