भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * वाल्मीकिजीके द्वारा सीताकी शुद्धताका परिचय * ५४१


देवता, असुर और गन्धर्व—सबने कौतूहलवश आपके पुत्रोंके मुखसे रामायणका गान सुना है। सुनकर सभी प्रसन्न ही हुए हैं! उन्होंने आपके पुत्रोंकी बड़ी प्रशंसा की है। उन दोनों बालकोंने अपने रूप, गान, अवस्था और गुणोंके द्वारा तीनों लोकोंको मोह लिया है। लोकपालोंने आशीर्वादरूपसे जो कुछ दिया, उसे आपके पुत्रोंने स्वीकार किया। उन्होंने ऋषियों तथा अन्य लोकोंसे भी बढ़कर कीर्ति पायी है। पुण्यश्लोक (पवित्र यशवाले) पुरुषोंके शिरोमणि श्रीरघुनाथजी ! आप त्रिलोकीनाथ होकर भी इस समय गृहस्थ-धर्मकी लीला कर रहे हैं; अतः विद्या, शील एवं सद्गुणोंसे विभूषित अपने दोनों पुत्रोंको उनकी मातासहित ग्रहण कीजिये। सीताने ही आपकी मरी हुई सेनाको जिलाकर उसे प्राण-दान दिया है—इससे सब लोगोंको उनकी शुद्धिका विश्वास हो गया है। [यह लोगोंकी प्रतीतिके लिये प्रत्यक्ष प्रमाण है] यह प्रसङ्ग पतित पुरुषोंको भी पावन बनानेवाला है। मानद ! सीताकी शुद्धिके विषयमें न तो आपसे कोई बात छिपी है, न हमलोगोंसे और न देवताओंसे ही। केवल साधारण लोगोंको कुछ भ्रम हो गया था, किन्तु उपर्युक्त घटनासे वह भी अवश्य दूर हो गया।

शेषजी कहते हैं—मुने ! भगवान् श्रीराम यद्यपि सर्वज्ञ हैं, तो भी जब वाल्मीकिजीने उन्हें इस प्रकार समझाया, तो वे उनकी स्तुति और नमस्कार करके लक्ष्मणसे बोले—'तात ! तुम सुमित्रसहित रथपर बैठकर धर्मचारिणी सीताको पुत्रोंसहित ले आनेके लिये अभी जाओ। वहाँ मेरे तथा मुनिके इन वचनोंको सुनाना और सीताको समझा-बुझाकर शीघ्र ही अयोध्यापुरीमें ले आना।'

लक्ष्मणने कहा—प्रभो ! मैं अभी जाऊँगा, यदि आप सब लोगोंका प्रिय संदेश सुनकर महारानी सीताजी यहाँ पधारेंगी तो समझूँगा, मेरी यात्रा सफल हो गयी।

श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर लक्ष्मण उनकी आज्ञासे रथपर बैठे और मुनिके एक शिष्य तथा सुमित्रको साथ लेकर आश्रमको गये। रास्तेमें यह सोचते जाते थे कि 'भगवती सीताको किस प्रकार प्रसन्न करना चाहिये?' ऐसा विचार करनेसे उनके हृदयमें कभी हर्ष होता था और कभी संकोच। वे दोनों भावोंके बीचकी स्थितिमें थे। इसी अवस्थामें सीताके आश्रमपर पहुँचे, जो उनके श्रमको दूर करनेवाला था। वहाँ लक्ष्मण रथसे उतरकर सीताके समीप गये और आँखोंमें आँसू भरकर 'आर्ये! पूजनीये !! भगवति !! कल्याणमयी !' इत्यादि संबोधनोंका बारम्बार उच्चारण करते हुए उनके चरणोंमें गिर पड़े। भगवती सीताने वात्सल्य-प्रेमसे विह्वल होकर लक्ष्मणको उठाया और इस प्रकार पूछा—'सौम्य ! मुनिजनोंको ही प्रिय लगनेवाले इस वनमें तुम कैसे आये? बताओ, माता कौसल्याके गर्भरूपी शुक्तिसे जो मौक्तिकके समान प्रकट हुए हैं, वे मेरे आराध्यदेव श्रीरघुनाथजी तो कुशलसे हैं न ? देवर ! उन्होंने अकीर्तिसे डरकर तुम्हें मेरे परित्यागका कार्य सौंपा था। यदि इससे भी संसारमें उनकी निर्मल कीर्तिका विस्तार हो सके तो मुझे संतोष ही होगा। मैं अपने प्राण देकर भी पतिदेवके सुयशको स्थिर रखना चाहती हूँ। उन्होंने मुझे त्याग दिया है तो भी मैंने उनका थोड़ी देरके लिये भी कभी त्याग नहीं किया है। [निरन्तर उन्हींका चिन्तन करती रहती हूँ] मेरे ऊपर सदा कृपा रखनेवाली माता कौसल्याको तो कोई कष्ट नहीं है? वे कुशलसे हैं न? भरत आदि भाई भी तो सकुशल हैं न? तथा महाभागा सुमित्रा, जो मुझे अपने प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय मानती हैं, कैसी हैं ? उनकी कुशल बताओ।'

इस प्रकार सीताने जब बारम्बार सबकी कुशल पूछी तो लक्ष्मणने कहा—'देवि ! महाराज कुशलसे हैं और आपकी भी कुशलता पूछ रहे हैं। माता कौसल्या, सुमित्रा तथा राजभवनकी अन्य सभी देवियोंने प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देते हुए आपकी कुशल पूछी है। भरत और शत्रुघ्नने कुशल-प्रश्नके साथ ही आपके श्रीचरणोंमें प्रणाम कहलाया है, जिसे मैं सेवामें निवेदन करता हूँ। गुरुओं तथा समस्त गुरुपत्नियोंने भी आशीर्वाद दिया है, साथ ही कुशल-मङ्गल भी पूछा है। महाराज श्रीराम आपको बुला रहे हैं। हमारे स्वामीने कुछ रोते-रोते आपके प्रति जो सन्देश दिया है, उसे सुनिये। वक्तके

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