पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 572, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंपातालखण्ड ] * श्रीराधा-कृष्ण और उनके पार्षदोंका वर्णन * ५५५ ********************************************************************************************************
बनी हुई है। उसके ऊपर सोनेके आभूषणोंसे विभूषित सुवर्णपीठ है, जिसके ऊपर अंशुभद्र आदि हजारों ग्वालबाल विराजते हैं। वे सब-के-सब एक समान सींग, वीणा, वेणु, बेंतकी छड़ी, किशोरावस्था, मनोहर वेष, सुन्दर आकार तथा मधुर स्वर धारण करते हैं। वे भगवान्के गुणोंका चिन्तन करते हुए उनका गान करते हैं तथा भगवत्-प्रेममय रससे विह्वल रहते हैं। ध्यानमें स्थिर होनेके कारण वे चित्र-लिखित-से जान पड़ते हैं। उनका रूप आश्चर्यजनक सौन्दर्यसे युक्त होता है। वे सदा आनन्दके आँसू बहाया करते हैं। उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च छाया रहता है तथा वे योगेश्वरोंकी भाँति सदा विस्मयविमुग्ध रहते हैं। अपने थनोंसे दूध बहानेवाली असंख्य गौएँ उन्हें घेरे रहती हैं। वहाँसे बाहरके भागमें एक सोनेकी चहारदीवारी है, जो करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान दिखायी देती है। उसके चारों ओर बड़े-बड़े उद्यान हैं, जिनकी मनोहर सुगन्ध सब ओर फैली रहती है।
जो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा पवित्र भावसे श्रीकृष्णचरित्रका भक्तिपूर्वक पाठ या श्रवण करता है, उसे भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है।
पार्वतीजीने पूछा- भगवन्! अत्यन्त मोहक रूप धारण करनेवाले श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ किन-किन विशेषताओंके कारण क्रीड़ा की, इस रहस्यका मुझसे वर्णन कीजिये।
महादेवजीने कहा- देवि! एक समयकी बात है, मुनिश्रेष्ठ नारद यह जानकर कि श्रीकृष्णका प्राकट्य हो चुका है, वीणा बजाते हुए नन्दजीके गोकुलमें पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने देखा महायोगमायाके स्वामी सर्वव्यापी भगवान् अच्युत बालकका स्वाँग धारण किये नन्दजीके घरमें कोमल बिछौनोंसे युक्त सोनेके पलंगपर सो रहे हैं और गोपकन्याएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ निरन्तर उनकी ओर निहार रही हैं। भगवान्का श्रीविग्रह अत्यन्त सुकुमार था। उनके काले-काले घुँघराले बाल सब ओर बिखरे हुए थे। किञ्चित्-किञ्चित् मुसकराहटके कारण उनके दो-एक दाँत दिखायी दे जाते थे। वे अपनी प्रभासे समूचे घरके भीतरी भागमें प्रकाश फैला रहे थे। नग्न शिशुके रूपमें भगवान्की झाँकी करके नारदजीको बड़ा हर्ष हुआ। वे भगवान्के प्रिय भक्त तो थे ही, गोपति नन्दजीसे बातचीत करके सब बातें बताने लगे, 'नन्दरायजी! भगवान्के भक्तोंका जीवन अत्यन्त दुर्लभ होता है। आपके इस बालकका प्रभाव अनुपम है, इसे कोई नहीं जानता। शिव और ब्रह्मा आदि देवता भी इसके प्रति सनातन प्रेम चाहते हैं। इस बालकका चरित्र सबको हर्ष प्रदान करनेवाला होगा। भगवद्भक्त पुरुष इस बालककी लीलाओंका श्रवण, गायन और अभिनन्दन करते हैं। आपके पुत्रका प्रभाव अचिन्त्य है। जिनका इसके प्रति हार्दिक प्रेम होगा, वे संसार-समुद्रसे तर जायँगे। उन्हें इस जगत्की कोई बाधा नहीं सतायेगी; अतः नन्दजी! आप भी इस बालकके प्रति निरन्तर अनन्य भावसे प्रेम कीजिये।'
यों कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी नन्दके घरसे निकले। नन्दने भी भगवद्बुद्धिसे उनका पूजन किया और प्रणाम करके उन्हें विदा दी। तदनन्तर वे महाभागवत मुनि मन-ही-मन सोचने लगे, 'जब भगवान्का अवतार हो