भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 579

५६२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


झाड़-बुहारकर साफ करना, उसे लीपना तथा पहलेके चढ़े हुए निर्माल्यको दूर हटाना—'अभिगमन' कहलाता है। पूजाके लिये चन्दन और पुष्पादिके संग्रहका नाम 'उपादान' है। अपने साथ अपने इष्टदेवकी आत्मभावना करना अर्थात् मेरा इष्टदेव मुझसे भिन्न नहीं है, वह मेरा ही आत्मा है; इस तरहकी भावनाको दृढ़ करना 'योग' कहा गया है। इष्टदेवके मन्त्रका अर्थानुसन्धानपूर्वक जप करना 'स्वाध्याय' है। सूक्त और स्तोत्र आदिका पाठ, भगवान्‌का कीर्तन तथा भगवत्-तत्त्व आदिका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका अभ्यास भी 'स्वाध्याय' कहलाता है। अपने आराध्यदेवकी यथार्थ विधिसे पूजा करनेका नाम 'इज्या' है। सुव्रते! यह पाँच प्रकारकी पूजा मैंने तुम्हें बतायी। यह क्रमशः सार्ष्टि, सामीप्य, सालोक्य, सायुज्य और सारूप्य नामक मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं।

अब प्रसङ्गवश शालग्राम-शिलाकी पूजाके सम्बन्धमें कुछ निवेदन करूँगा। चार भुजाधारी भगवान् विष्णुके दाहिनी एवं ऊर्ध्वभुजाके क्रमसे अस्त्रविशेष ग्रहण करनेपर केशव आदि नाम होते हैं अर्थात्, दाहिनी ओरका ऊपरका हाथ, दाहिनी ओरका नीचेका हाथ, बायीं ओरका ऊपरका हाथ और बायीं ओरका नीचेका हाथ—इस क्रमसे चारों हाथोंमें शङ्ख, चक्र आदि आयुधोंको क्रम या व्यतिक्रमपूर्वक धारण करनेपर भगवान्‌की भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ होती हैं। उन्हीं संज्ञाओंका निर्देश करते हुए यहाँ भगवान्‌का पूजन बतलाया जाता है। उपर्युक्त क्रमसे चारों हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले विष्णुका नाम 'केशव' है। पद्म, गदा, चक्र और शङ्खके क्रमसे शस्त्र धारण करनेपर उन्हें 'नारायण' कहते हैं। क्रमशः चक्र, शङ्ख, पद्म और गदा ग्रहण करनेसे वे 'माधव' कहलाते हैं। गदा, पद्म, शङ्ख और चक्र—इस क्रमसे आयुध धारण करनेवाले भगवान्‌का नाम 'गोविन्द' है। पद्म, शङ्ख, चक्र और गदाधारी विष्णुरूप भगवान्‌को प्रणाम है। शङ्ख, पद्म, गदा और चक्र धारण करनेवाले मधुसूदन-विग्रहको नमस्कार है। गदा, चक्र, शङ्ख और पद्मसे युक्त त्रिविक्रमको तथा चक्र, गदा, पद्म और शङ्खधारी वामनमूर्तिको प्रणाम है। चक्र, पद्म, शङ्ख और गदा धारण करनेवाले श्रीधररूपको नमस्कार है। चक्र, गदा, शङ्ख तथा पद्मधारी हृषीकेश ! आपको प्रणाम है। पद्म, शङ्ख, गदा और चक्र ग्रहण करनेवाले पद्मनाभविग्रहको नमस्कार है। शङ्ख, गदा, चक्र और पद्मधारी दामोदर ! आपको मेरा प्रणाम है। शङ्ख, कमल, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले संकर्षणको नमस्कार है। चक्र, शङ्ख गदा तथा पद्मसे युक्त भगवान् वासुदेव ! आपको प्रणाम है। शङ्ख, चक्र, गदा और कमल आदिके द्वारा प्रद्युम्नमूर्ति धारण करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार है। गदा, शङ्ख, कमल तथा चक्रधारी अनिरुद्धको प्रणाम है। पद्म, शङ्ख, गदा और चक्रसे चिह्नित पुरुषोत्तमरूपको नमस्कार है। गदा, शङ्ख, चक्र और पद्म ग्रहण करनेवाले अधोक्षजको प्रणाम है। पद्म, गदा, शङ्ख और चक्र धारण करनेवाले नृसिंह भगवान्‌को नमस्कार है। पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा लेनेवाले अच्युतस्वरूपको प्रणाम है। गदा, पद्म, चक्र और शङ्खधारी श्रीकृष्णविग्रहको नमस्कार है।

जिस शालग्राम-शिलामें द्वार-स्थानपर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्लवर्णकी रेखासे अङ्कित और शोभासम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान् श्रीगदाधरका स्वरूप समझना चाहिये। सङ्कर्षणमूर्तिमें दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है। प्रद्युम्नके स्वरूपमें कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्रका चिह्न सूक्ष्म रहता है। अनिरुद्धकी मूर्ति गोल होती है और उसके भीतरी भागमें गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वारभागमें नीलवर्ण और तीन रेखाओंसे युक्त भी होती है। भगवान् नारायण श्यामवर्णके होते हैं, उनके मध्यभागमें गदाके आकारकी रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है। भगवान् नृसिंहकी मूर्तिमें चक्रका स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच विन्दुओंसे युक्त होते हैं। ब्रह्मचारीके लिये उन्हींका पूजन विहित है। वे भक्तोंकी रक्षा करनेवाले हैं। जिस शालग्राम-शिलामें दो चक्रके