भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 583

५६६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


जप करनेसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। दिन, रात और सन्ध्या—सभी समय नाम-स्मरण करना चाहिये। दिन-रात हरि-नामका जप करनेवाला पुरुष श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन पाता है। अपवित्र हो या पवित्र, सब समय, निरन्तर भगवन्नामका स्मरण करनेसे वह क्षणभरमें भव-बन्धनसे छुटकारा पा जाता है।* भगवान्‌का नाम नाना प्रकारके अपराधोंसे युक्त मनुष्यका पाप भी हर लेता है। कलियुगमें यज्ञ, व्रत, तप और दान—कोई भी कर्म सब अङ्गोंसे पूर्ण नहीं उतरता; केवल गङ्गाका स्नान और हरि-नामका कीर्तन—ये ही दो साधन विघ्न-बाधाओंसे रहित हैं। कल्याणी! हत्याजनित हजारों भयङ्कर पाप तथा दूसरे-दूसरे पातक भी भगवान्‌के गोविन्द नामका उच्चारण करनेसे नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी दशामें क्यों न स्थित हो, जो पुण्डरीकाक्ष (कमल-नयन) भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर—सब ओरसे पवित्र हो जाता है। † केवल भगवन्नामोंके स्मरणसे तथा भगवान्‌के चरणोंका चिन्तन करनेसे शुद्धि होती है। सोने, चाँदी, भिगोये हुए आटे अथवा पुष्प-मालाके द्वारा भगवान्‌के चरणोंकी आकृति बनाकर उसे चक्र आदि चिह्नोंसे अङ्कित कर ले, उसके बाद पूजन आरम्भ करे। पूजनके समय भगवच्चरणोंका इस प्रकार ध्यान करे—भगवान् अपने दाहिने पैरके अँगूठेकी जड़में प्रणतजनोंके संसार-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये चक्रका चिह्न धारण करते हैं। मध्यमा अँगुलीके मध्यभागमें अच्युतने अत्यन्त सुन्दर कमलका चिह्न धारण कर रखा है; उसका उद्देश्य है—ध्यान करनेवाले भक्तोंके चित्तरूपी भ्रमरको लुभाना। कमलके नीचे वे ध्वजका चिह्न धारण करते हैं, जो मानो समस्त अनर्थोंको परास्त करके फहरानेवाली विजय-ध्वजा है। कनिष्ठिका अँगुलीकी जड़में वज्रका चिह्न है, जो भक्तोंकी पापराशिको विदीर्ण करनेवाला है। पैरके पार्श्व-भागमें बीचकी ओर अङ्कुशका चिह्न है, जो भक्तोंके चित्तरूपी हाथीका दमन करनेवाला है। श्रीहरि अपने अङ्गुष्ठके पर्वमें भोग-सम्पत्तिके प्रतीकभूत यवका चिह्न धारण करते हैं तथा मूल-भागमें गदाकी रेखा है, जो समस्त देहधारियोंके पापरूपी पर्वतको चूर्ण कर डालनेवाली है। इतना ही नहीं, वे अजन्मा भगवान् सम्पूर्ण विद्याओंको प्रकाशित करनेके लिये भी पद्म आदि चिह्नोंको धारण करते हैं। दाहिने पैरमें जो-जो चिह्न हैं, उन्हीं-उन्हीं चिह्नोंको करुणानिधान प्रभु अपने बायें पैरमें भी धारण करते हैं; इसलिये गोविन्दके माहात्म्यका, जो आनन्दमय रसके कारण अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है, सदा श्रवण और कीर्तन करना चाहिये। ऐसा करनेवाले मनुष्यकी मुक्ति होनेमें तनिक भी सन्देह नहीं है।

अब मैं प्रत्येक मासका वह कृत्य बतला रहा हूँ, जो भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला है। जेठके महीनेमें पूर्णिमा तिथिको स्नान आदिसे पवित्र होकर यत्नपूर्वक श्रीहरिका स्नानोत्सव मनाना चाहिये, इससे दिन, पक्ष, मास, ऋतु और वर्षभरके पाप नष्ट हो जाते हैं। कोटि-कोटि सहस्र जो पातक और उपपातक होते हैं, उन सबका नाश हो जाता है। स्नानके समय कलशमें जल लेकर भगवान्‌के मस्तकपर धीरे-धीरे गिराना चाहिये और पुरुषसूक्तके मन्त्रों तथा पावमानी ऋचाओंका क्रमशः पाठ करते रहना चाहिये। नारियल-युक्त जल, तालफलसे युक्त जल, रत्नमिश्रित जल, चन्दनमिश्रित जल तथा पुष्पयुक्त जल—इन पाँच उपचारोंसे स्नान कराकर अपने वैभव-विस्तारके अनुसार भगवान्‌की आराधना करे। तत्पश्चात् 'घं घण्टायै नमः' इस मन्त्रको पढ़कर घण्टा बजावे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'अपनी ऊँची आवाजसे पतितोंकी पातकराशिका निवारण करनेवाली घण्टे! घोर संसारसागरमें पड़े हुए मुझ पापीकी रक्षा करो।' जो श्रोत्रिय विद्वान् ब्राह्मण पवित्रभावसे इस प्रकार भगवान्‌की


* अशुचिर्वा शुचिर्वापि सर्वकालेषु सर्वदा। नामसंस्मरणादेव संसारान्मुच्यते क्षणात्॥ (८०।७, ८)
† अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ (८०।११)