भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पातालखण्ड ] * वैशाख मासमें स्नान, तर्पण और श्रीमाधव-पूजनकी विधि एवं महिमा * ५८९


पापप्रशमनं स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयान्नरः ।
शारीरैर्मानसैर्वाचा कृतैः पापैः प्रमुच्यते ॥
मुक्तः पापग्रहादिभ्यो याति विष्णोः परं पदम् ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रं सर्वाघनाशनम् ॥
प्रायश्चित्तमघौघानां पठितव्यं नरोत्तमैः । *

यह 'पापप्रशमन' नामक स्तोत्र है। जो मनुष्य इसे पढ़ता और सुनता है, वह शरीर, मन और वाणीद्वारा किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, वह पापग्रह आदिके भयसे भी मुक्त होकर विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। यह स्तोत्र सब पापोंका नाशक तथा पापराशिका प्रायश्चित्त है; इसलिये श्रेष्ठ मनुष्योंको पूर्ण प्रयत्न करके इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये।

राजन् ! इस स्तोत्रके श्रवणमात्रसे पूर्वजन्म तथा इस जन्मके किये हुए पाप भी तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र पापरूपी वृक्षके लिये कुठार और पापमय ईंधनके लिये दावानल है। पापराशिरूपी अन्धकार-समूहका नाश करनेके लिये यह स्तोत्र सूर्यके समान है। मैंने सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये इसे तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है। इसके पुण्यमय माहात्म्यका वर्णन करनेमें स्वयं श्रीहरि भी समर्थ नहीं हैं।

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वैशाख मासमें स्नान, तर्पण और श्रीमाधव-पूजनकी विधि एवं महिमा

**अम्बरीषने पूछा—**मुने ! वैशाख मासके व्रतका क्या विधान है ? इसमें किस तपस्याका अनुष्ठान करना पड़ता है ? क्या दान होता है ? कैसे स्नान किया जाता है और किस प्रकार भगवान् केशवकी पूजा की जाती है ? ब्रह्मर्षे ! आप श्रीहरिके प्रिय भक्त तथा सर्वज्ञ हैं; अतः कृपा करके मुझे ये सब बातें बताइये।

**नारदजीने कहा—**साधुश्रेष्ठ ! सुनो—वैशाख मासमें जब सूर्य मेषराशिपर चले जायें तो किसी बड़ी नदीमें, नदीरूप तीर्थमें, नदमें, सरोवरमें, झरनेमें, देवकुण्डमें, स्वतः प्राप्त हुए किसी भी जलाशयमें, बावड़ीमें अथवा कुएँ आदिपर जाकर नियमपूर्वक भगवान् श्रीविष्णुका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये। स्नानके पहले निम्नाङ्कित श्लोकका उच्चारण करना चाहिये—

यथा ते माधवो मासो वल्लभो मधुसूदन ।
प्रातःस्नानेन मे तस्मिन् फलदः पापहा भव ॥
(८९।११)

'मधुसूदन ! माधव (वैशाख) मास आपको विशेष प्रिय है, इसलिये इसमें प्रातःस्नान करनेसे आप शास्त्रोक्त फलके देनेवाले हों और मेरे पापोंका नाश कर दें।'

इस प्रकार कहकर मौनभावसे उस तीर्थके किनारे अपने दोनों पैर धो ले; फिर भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए विधिपूर्वक स्नान करे। स्नानकी विधि इस प्रकार है—विद्वान् पुरुषको मूल-मन्त्र पढ़कर तीर्थकी कल्पना कर लेनी चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र ही मूल-मन्त्र कहा गया है। पहले हाथमें कुश लेकर विधिपूर्वक आचमन करे तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए बाहर-भीतरसे पवित्र रहे। फिर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें निम्नाङ्कित मन्त्रोंद्वारा भगवती श्रीगङ्गाजीका आवाहन करे।

विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्णुदेवता ॥
त्राहि नस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात् ।
तिस्रःकोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत् ॥
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्ति जाह्नवि ।
नन्दिनीति च ते नाम देवेषु नलिनीति च ॥
दक्षा पृथ्वी वियद्गङ्गा विश्वकाया शिवामृता ।
विद्याधरी महादेवी तथा लोकप्रसादिनी ॥
क्षेमङ्करी जाह्नवी च शान्ता शान्तिप्रदायिनी ।
(८९। १५—१९)

'गङ्गे ! तुम भगवान् श्रीविष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई


* अध्याय ८८ श्लोक ७२ से ९१ तक।