भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 635

१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


मन्ये नात्मकृतिर्न पूर्वपुरुषप्राप्तेर्बलं चात्र त-
त्रापीदं स्वजनप्रमाणमचलं किं शापतापादिकम्।
या दुष्प्रापगयाप्रयागयमुनाकाशीषु पर्वागमात्
प्राप्तिस्तत्र महाफलो विजयते श्रीशारदानुग्रहः ॥

कोई पुण्यपर्व आनेपर जो गया, प्रयाग, यमुना और काशी आदि दुर्लभ तीर्थोंमें आनेका सौभाग्य प्राप्त होता है, उसमें महान् फलदायक भगवती शारदाका अनुग्रह ही एकमात्र कारण है; उसीकी विजय है। मैं इसे अपना पुरुषार्थ नहीं मानता। पूर्वजोंने जो यहाँ आकर पुण्योपार्जन किया है, उसका बल भी इसमें सहायक नहीं है तथा स्वजनवर्गकी अविचल शक्ति भी इसमें कारण नहीं है। इन तीर्थोंमें आनेपर शाप-ताप आदि क्या कर सकते हैं।

यः श्राद्धसमये दूरात्स्मृतोऽपि पितृमुक्तिदः।
तं गयायां स्थितं साक्षान्नमामि श्रीगदाधरम् ॥

जो श्राद्ध-कालमें दूरसे स्मरण करनेपर भी पितरोंको मोक्ष प्रदान करते हैं, गयामें स्थित उन साक्षात् भगवान् श्रीगदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ।

पन्थानं समतीत्य दुस्तरमिमं दूराद्दवीयस्तरं
क्षुद्रव्याघ्रतरक्षकण्टकफणिप्रत्यर्थिभिः संकुलम्।
आगत्य प्रथमं ह्ययं कृपणवाग् याचेज्जनः कं परं
श्रीमद्द्वारि गदाधर प्रतिदिनं त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते ॥

भगवान् गदाधर ! यह आपका दास मक्खी, मच्छर, बाघ, चीते, काँटे, सर्प तथा लुटेरोंसे भरे हुए इस दुस्तर मार्गको, जो दूरसे भी दूर पड़ता है, तै करके पहले-पहल यहाँ आया है और दीन वाणीमें आपसे याचना करता है। भला, आपके सिवा और किसके सामने यह हाथ फैलाये। भगवन् ! यह सेवक प्रतिदिन आपके शोभासम्पन्न द्वारपर आकर दर्शनके लिये उत्कण्ठित रहता है।

सर्वात्मन्निजदर्शनेन च गयाश्राद्धेन वै दैवतान्
प्रीणन् विश्वमनीहवत् कथमिहौदासीन्यमालम्बसे।
किं ते सर्वद निर्दयत्वमधुना किं वा प्रभुत्वं कलेः
किं वा सत्त्वनिरीक्षणं नृषु चिरं किं वास्य सेवारुचिः ॥

सर्वात्मन् ! आप अपने दर्शनसे तथा गयामें किये जानेवाले श्राद्धसे देवताओंसहित सम्पूर्ण विश्वको तृप्त करते हैं; फिर मेरे सामने क्यों निश्चेष्ट-से होकर उदासीन भाव धारण कर रहे हैं ? भक्तको सर्वस्व देनेवाले दयामय ! क्या इस समय आपने निर्दयता धारण कर ली है ? या यह कलियुगका प्रभाव है ? अथवा देर लगाकर आप मनुष्योंके सत्त्व (शुद्ध भाव एवं धैर्य) की परीक्षा ले रहे हैं या इस दासकी भगवत्सेवामें कितनी रुचि है, इसका निरीक्षण कर रहे हैं ?

गदाधर मया श्राद्धं यच्चीर्णं त्वत्प्रसादतः।
अनुजानीहि मां देव गमनाय गृहं प्रति ॥*

गदाधर ! आपकी कृपासे मैंने यहाँ श्राद्धका अनुष्ठान किया है; [इसे स्वीकार कीजिये और] देव ! अब मुझे घर जानेकी आज्ञा दीजिये।

एवं हि देवतानां च स्तोत्रं स्वर्गार्थदायकम्।
श्राद्धकाले पठेन्नित्यं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥
सर्वतीर्थसमं स्नानं श्रवणात्पठनाज्जपात् ॥
प्रयागस्य च गङ्गाया यमुनायाः स्तुतेर्द्विज।
श्रवणेन विनश्यन्ति दोषाश्चैव तु कर्मजाः ॥
(२३।५१, ५३, ५४)

इस प्रकार यह देवताओंका स्तोत्र स्वर्ग एवं अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें तथा प्रतिदिन स्नानके समय इसका पाठ करता है, उसे सब तीर्थोंमें स्नानके समान पुण्य होता है। इसके श्रवण, पाठ तथा जपसे उक्त फलकी सिद्धि होती है। ब्रह्मन् ! प्रयाग, गङ्गा तथा यमुनाकी स्तुतिका श्रवण करनेसे कर्मजन्य दोष नष्ट हो जाते हैं।


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* अध्याय २३ श्लोक १५से ५०तक।