भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 639

६२२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ****************************************************************************************

विलेपन-मन्त्र श्रीखण्डागुरुकर्पूरकुङ्कुमादिविलेपनम् ।
भक्त्या दत्तंमयाऽऽघ्रेयं लक्ष्म्या सह गृहाण वै ॥
'भगवन् ! मैंने चन्दन, अरगजा, कपूर और केसर आदिका सुगन्धित अङ्गराग भक्तिपूर्वक अर्पण किया है; आप श्रीलक्ष्मीजीके साथ इसे स्वीकार करें।'

वस्त्र-मन्त्र नारायण नमस्तेऽस्तु नरकार्णवतारण ।
त्रैलोक्याधिपते तुभ्यं ददामि वसनं शुचि ॥
'नरकके समुद्रसे तारनेवाले नारायण ! आपको नमस्कार है। त्रिलोकीनाथ ! मैं आपको पवित्र वस्त्र अर्पण करता हूँ।'

यज्ञोपवीत-मन्त्र दामोदर नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात् ।
ब्रह्मसूत्रं मया दत्तं गृहाण पुरुषोत्तम ॥
'दामोदर ! आपको नमस्कार है, भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। पुरुषोत्तम ! मैंने ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत) अर्पण किया है, आप इसे ग्रहण करें।'

पुष्प-मन्त्र पुष्पाणि च सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो ।
मया दत्तानि देवेश प्रीतितः प्रतिगृह्यताम् ॥
'प्रभो ! मैंने मालती आदिके सुगन्धित पुष्प सेवामें प्रस्तुत किये हैं, देवेश्वर ! आप इन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें।'

नैवेद्य-मन्त्र नैवेद्यं गृह्यतां नाथ भक्ष्यभोज्यैः समन्वितम् ।
सर्वै रसैः सुसम्पन्नं गृहाण परमेश्वर ॥
'नाथ ! भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त नैवेद्य स्वीकार कीजिये; परमेश्वर ! यह सब रसोंसे सम्पन्न है, इसे ग्रहण करें।'

ताम्बूल-मन्त्र पूगानि नागपत्राणि कर्पूरसहितानि च ।
मया दत्तानि देवेश ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
'देवेश्वर ! मैंने सुपारी, पानके पत्ते और कपूर आपकी सेवामें भेंट किये हैं; आप यह बीड़ा स्वीकार करें।'

तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक धूप, अगर तथा घी मिलाया हुआ गुग्गुल—इनकी आहुति देकर भगवान्‌को सुँघाये। इस प्रकार पूजा करनी चाहिये। घीका दीपक जलाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ ! एकाग्रचित्त हो भगवान् श्रीलक्ष्मी-नारायणके सामने तथा तुलसीवनके समीप नाना प्रकारका दीपक सजाना चाहिये। चक्रधारी देवाधिदेव विष्णुको प्रतिदिन अर्घ्य भी देना चाहिये। पुत्र-प्राप्तिके लिये नवमीको नारियलका अर्घ्य देना उत्तम है। धर्म, काम तथा अर्थ—तीनोंकी सिद्धिके लिये दशमीको बिजौरेका अर्घ्य अर्पण करना उचित है तथा एकादशीको अनारसे अर्घ्य देना चाहिये; इससे सदा दरिद्रताका नाश होता है। नारद ! बाँसके पात्रमें सप्तधान्य रखकर उसमें सात फल रखे; फिर तुलसीदल, फूल एवं सुपारी डालकर उस पात्रको वस्त्रसे ढक दे। तत्पश्चात् उसे भगवान्‌के सम्मुख निवेदन करे। विप्रेन्द्र ! अर्घ्य निम्नाङ्कित मन्त्रसे देना चाहिये; इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो—

अर्घ्य-मन्त्र तुलसीसहितो देव सदा शङ्खेन संयुतम् ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं देवदेव नमोऽस्तु ते ॥
'देव ! आप तुलसीजीके साथ मेरे दिये हुए इस शङ्खयुक्त अर्घ्यको ग्रहण करें। देवदेव ! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार लक्ष्मीसहित देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करके व्रतकी पूर्तिके निमित्त उन देवदेवेश्वरसे प्रार्थना करे—
उपोषितोऽहं देवेश कामक्रोधविवर्जितः ।
व्रतेनानेन देवेश त्वमेव शरणं मम ॥
गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यदपूर्णं कृतं मया ।
सर्वं तदस्तु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥
नमः कमलपत्राक्ष नमस्ते जलशायिने ।
इदं व्रतं मया चीर्णं प्रसादात्तव केशव ॥