भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 645

६२८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


धारण करनेसे ब्राह्मण निश्चय ही मुक्तिका भागी होता है।* मृत्युके समय भी जिसके ललाटपर गोपीचन्दनका तिलक रहता है, वह विमानपर आरूढ हो विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। नारद ! कलियुगमें जो नरश्रेष्ठ गोपीचन्दनका तिलक धारण करते हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती। ब्रह्मन् ! इस पृथ्वीपर जो शराबी, स्त्री और बालकोंकी हत्या करनेवाले तथा अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले देखे जाते हैं, वे भगवद्भक्तोंके दर्शनमात्रसे पापमुक्त हो जाते हैं। मैं भी भगवान् विष्णुकी भक्तिके प्रसादसे वैष्णव हुआ हूँ।


संवत्सरदीप-व्रतकी विधि और महिमा

नारदजी बोले— भगवन् ! अब मुझे सब व्रतोंमें प्रधान 'संवत्सरदीप' नामक व्रतकी उत्तम विधि बताइये, जिसके करनेसे सब व्रतोंके अनुष्ठानका फल निस्संदेह प्राप्त हो जाय, सब कामनाओंकी सिद्धि हो तथा सब पापोंका नाश हो जाय।

महादेवजीने कहा— देवर्षे ! मैं तुम्हें एक पापनाशक रहस्य बताता हूँ, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा, गोघाती, मित्रहन्ता, गुरुस्त्रीगामी, विश्वासघाती तथा क्रूर हृदयवाला मनुष्य भी शाश्वत मोक्षको प्राप्त होता है तथा अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके विष्णुलोकको जाता है। वह रहस्य संवत्सरदीपव्रत है, जो बहुत ही श्रेयस्कर व्रत है। मैं उसकी विधि और महिमाका वर्णन करूँगा। हेमन्त ऋतुके प्रथम मास—अगहनमें शुभ एकादशी तिथि आनेपर ब्राह्ममुहूर्तमें उठे और काम-क्रोधसे रहित हो नदीके संगम, तीर्थ, पोखरे या नदीमें जाकर स्नान करे अथवा मनको वशमें रखते हुए घरपर ही स्नान करे। स्नान करनेका मन्त्र इस प्रकार है—

स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु गर्ते प्रस्रवणेषु च।
नदीषु सर्वतीर्थेषु तत्स्नानं देहि मे सदा॥

'मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों तथा नदियोंमें स्नान कर चुका। जल! तुम मुझे उन सबमें स्नान करनेका फल प्रदान करो।'

तदनन्तर देवताओं और पितरोंका तर्पण करके जप करनेके अनन्तर जितेन्द्रिय पुरुष देवदेव भगवान् लक्ष्मीनारायणका पूजन करे। पहले पञ्चामृतसे नहलाकर फिर चन्दनयुक्त जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात् इस प्रकार कहे—

स्नातोऽसि लक्ष्म्या सहितो देवदेव जगत्पते।
मां समुद्धर देवेश घोरात् संसारबन्धनात्॥

'देवदेव ! जगत्पते ! देवेश्वर ! आप लक्ष्मीजीके साथ स्नान कर चुके हैं; इस घोर संसार-बन्धनसे मेरा उद्धार कीजिये।'

इसके बाद वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका पूजन करे। 'अतो देव' इस सूक्तसे अथवा पुरुषसूक्तसे पूजा करनी चाहिये। अथवा—

नमो मत्स्याय देवाय कूर्मदेवाय वै नमः।
नमो वाराहदेवाय नरसिंहाय वै नमः॥
वामनाय नमस्तुभ्यं परशुरामाय ते नमः।
नमोऽस्तु रामदेवाय विष्णुदेवाय ते नमः॥
नमोऽस्तु बुद्धदेवाय कल्किने च नमो नमः।
नमः सर्वात्मने तुभ्यं शिरसेत्यभिपूजयेत्॥

'मत्स्य, कच्छप, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्की—ये दस अवतार धारण करनेवाले आप सर्वात्माको मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।' यों कहकर पूजन करे।

अथवा भगवान्के जो 'केशव' आदि प्रसिद्ध नाम हैं, उनके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये।

धूपका मन्त्र

वनस्पतिरसो दिव्यः सुरभिर्गन्धवाञ्छुचिः।
धूपोऽयं देवदेवेश नमस्ते प्रतिगृह्यताम्॥


* तुलसीपत्रमालां च तुलसीकाष्ठसंभवाम्। धृत्वा वै ब्राह्मणो भूयान्मुक्तिभागी न संशयः॥ (३०।१९)