पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 652, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] $\quad\quad$ * महाराज दशरथका शनिको संतुष्ट करके लोकका कल्याण करना * $\quad\quad$ ६३५
उपलब्ध होता है। तीनों काल स्नान करनेवाला मनुष्य रूपवान् होता है। वायु पीकर रहनेवाला यज्ञका फल पाता है। जो उपवास करता है, वह चिरकालतक स्वर्गमें निवास करता है। जो सदा भूमिपर शयन करता है, उसे अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है, जो पवित्र धर्मका आचरण करता है, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। जो द्विजश्रेष्ठ बृहस्पतिजीके इस पवित्र मतका स्वाध्याय करते हैं, उनकी आयु, विद्या, यश और बल—ये चार बातें बढ़ती हैं।
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महाराज दशरथका शनिको संतुष्ट करके लोकका कल्याण करना
नारदजीने पूछा— सुरश्रेष्ठ ! शनैश्चरकी दी हुई पीड़ा कैसे दूर होती है ? यह मुझे बताइये।
महादेवजी बोले— देवर्षे ! सुनो, ये शनैश्चर देवताओंमें प्रसिद्ध कालरूपी महान् ग्रह हैं। इनके मस्तकपर जटा है, शरीरमें बहुत-से रोएँ हैं तथा ये दानवोंको भय पहुँचानेवाले हैं। पूर्वकालकी बात है, रघुवंशमें दशरथ नामके एक बहुत प्रसिद्ध राजा हो गये हैं। वे चक्रवर्ती सम्राट्, महान् वीर तथा सातों द्वीपोंके स्वामी थे। उन दिनों ज्योतिषियोंने यह जानकर कि शनैश्चर कृत्तिकाके अन्तमें जा पहुँचे हैं, राजाको सूचित किया—'महाराज ! इस समय शनि रोहिणीका भेदन करके आगे बढ़ेंगे; यह अत्यन्त उग्र शाकटभेद नामक योग है, जो देवताओं तथा असुरोंके लिये भी भयंकर है। इससे बारह वर्षोंतक संसारमें अत्यन्त भयानक दुर्भिक्ष फैलेगा।' यह सुनकर राजाने मन्त्रियोंके साथ विचार किया और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणोंसे पूछा—'द्विजवरो ! बताइये, इस संकटको रोकनेका यहाँ कौन-सा उपाय है ?'
वसिष्ठजी बोले— राजन् ! यह रोहिणी प्रजापति ब्रह्माजीका नक्षत्र है, इसका भेद हो जानेपर प्रजा कैसे रह सकती है। ब्रह्मा और इन्द्र आदिके लिये भी यह योग असाध्य है।
महादेवजी कहते हैं— नारद ! इस बातपर विचार करके राजा दशरथने मनमें महान् साहसका संग्रह किया और दिव्यास्त्रोंसहित दिव्य धनुष लेकर आरूढ़ हो बड़े वेगसे वे नक्षत्र-मण्डलमें गये। रोहिणीपृष्ठ सूर्यसे सवा लाख योजन ऊपर है; वहाँ पहुँचकर राजाने धनुषको कानतक खींचा और उसपर संहारास्त्रका संधान किया। वह अस्त्र देवता और असुरोंके लिये भयंकर था। उसे देखकर शनि कुछ भयभीत हो हँसते हुए बोले—'राजेन्द्र ! तुम्हारा महान् पुरुषार्थ शत्रुको भय पहुँचानेवाला है। मेरी दृष्टिमें आकर देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग—सब भस्म हो जाते हैं; किन्तु तुम बच गये। अतः महाराज ! तुम्हारे तेज और पौरुषसे मैं संतुष्ट हूँ। वर माँगो; तुम अपने मनसे जो कुछ चाहोगे, उसे अवश्य दूँगा।'
दशरथने कहा— शनिदेव ! जबतक नदियाँ और समुद्र हैं, जबतक सूर्य और चन्द्रमासहित पृथ्वी कायम है, तबतक आप रोहिणीका भेदन करके आगे न बढ़ें। साथ ही कभी बारह वर्षोंतक दुर्भिक्ष न करें।
शनि बोले— एवमस्तु।