भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तरखण्ड ] * पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य * ६३९

मिलता है, वह त्रिस्पृशाके उपवाससे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। द्विजश्रेष्ठ ! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा अन्य जातिके लोग भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर इस व्रतको करते हैं, वे सब इस धराधामको छोड़नेपर मुक्त हो जाते हैं। इसमें द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये। यह मन्त्रोंमें मन्त्रराज माना गया है। इसी प्रकार त्रिस्पृशा सब व्रतोंमें उत्तम बतायी गयी है। जिसने इसका व्रत किया, उसने सम्पूर्ण व्रतोंका अनुष्ठान कर लिया। पूर्वकालमें स्वयं ब्रह्माजीने इस व्रतको किया था; तदनन्तर अनेकों ऋषियोंने भी इसका अनुष्ठान किया; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। नारद ! यह त्रिस्पृशा मोक्ष देनेवाली है।


पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य

नारदजीने पूछा— महादेव ! 'पक्षवर्धिनी' नामवाली तिथि कैसी होती है, जिसका व्रत करनेसे मनुष्य महान् पापसे छुटकारा पा जाता है ?

श्रीमहादेवजी बोले— यदि अमावास्या अथवा पूर्णिमा साठ दण्डकी होकर दिन-रात अविकल रूपसे रहे और दूसरे दिन प्रतिपदमें भी उसका कुछ अंश चला गया हो तो वह 'पक्षवर्धिनी' मानी जाती है। उस पक्षकी एकादशीका भी यही नाम है, वह दस हजार अश्वमेध यज्ञोंके समान फल देनेवाली होती है। अब उस दिन की जानेवाली पूजाविधिका वर्णन करता हूँ, जिससे भगवान् लक्ष्मीपतिको संतोष प्राप्त होता है। सबसे पहले जलसे भरे हुए कलशकी स्थापना करनी चाहिये। कलश नवीन हो—फूटा-टूटा न हो और चन्दनसे चर्चित किया गया हो। उसके भीतर पञ्चरत्न डाले गये हों तथा वह कलश फूलकी मालाओंसे आवृत हो। उसके ऊपर एक ताँबेका पात्र रखकर उसमें गेहूँ भर देना चाहिये। उस पात्रमें भगवान्‌के सुवर्णमय विग्रहकी स्थापना करे। जिस मासमें पक्षवर्धिनी तिथि पड़ी हो, उसीका नाम भगवद्विग्रहका भी नाम समझना चाहिये। जगत्‌के स्वामी देवेश्वर जगन्नाथका स्वरूप अत्यन्त मनोहर बनवाना चाहिये। फिर विधिपूर्वक पञ्चामृतसे भगवान्‌को नहलाना तथा कुङ्कुम, अरगजा और चन्दनसे अनुलेप करना चाहिये। फिर दो वस्त्र अर्पण करने चाहिये; उनके साथ छत्र और जूते भी हों। इसके बाद कलशपर विराजमान देवेश्वर श्रीहरिकी पूजा आरम्भ करे। 'पद्मनाभाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी, 'विश्वमूर्तये नमः' बोलकर दोनों घुटनोंकी, 'ज्ञानगम्याय नमः' से दोनों जाँघोंकी, 'ज्ञानप्रदाय नमः' से कटिभागकी, 'विश्वनाथाय नमः' से उदरकी, 'श्रीधराय नमः' से हृदयकी, 'कौस्तुभकण्ठाय नमः' से कण्ठकी, 'क्षत्रान्तकारिणे नमः' से दोनों बाँहोंकी, 'व्योममूर्ते नमः' से ललाटकी तथा 'सर्वरूपिणे नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न अस्त्रोंका भी उनके नाममन्त्रद्वारा पूजन करना उचित है। अन्तमें 'दिव्यरूपिणे नमः' कहकर भगवान्‌के सम्पूर्ण अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये।

इस तरह विधिवत् पूजन करके विद्वान् पुरुष सुन्दर नारियलके द्वारा चक्रधारी देवदेव श्रीहरिको अर्घ्य प्रदान करे। इस अर्घ्यदानसे ही व्रत पूर्ण होता है। अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—

संसारार्णवमग्नं भो मामुद्धर जगत्पते ।
त्वमीशः सर्वलोकानां त्वं साक्षाच्च जगत्पतिः ॥
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं पद्मनाभ नमोऽस्तु ते ।
(३८ । १४-१५)

'जगदीश्वर ! मैं संसारसागरमें डूब रहा हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। आप सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर तथा साक्षात् जगत्पति परमेश्वर हैं। पद्मनाभ ! आपको नमस्कार है। मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'

तत्पश्चात् भगवान् केशवको भक्तिपूर्वक भाँति-भाँतिके नैवेद्य अर्पण करे, जो मनको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले और मधुर आदि छहों रसोंसे युक्त हों। इसके बाद भगवान्‌को भक्तिके साथ कर्पूरयुक्त ताम्बूल निवेदन करे। घी अथवा तिलके तेलसे दीपक जलाकर रखे।