पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 667, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें६५०
- अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् *
[ संक्षिप्त पद्मपुराण
समय सहसा आकाशवाणी हुई- 'राजकुमार ! तुम
कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। इसलिये दोनों
'सफला' एकादशीके प्रसादसे राज्य और पुत्र प्राप्त
पति-पत्नी सदा चिन्ता और शोकमें डूबे रहते थे। राजाके
करोगे।' 'बहुत अच्छा' कहकर उसने वह वरदान
पितर उनके दिये हुए जलको शोकोच्छ्वाससे गरम
स्वीकार किया। इसके बाद उसका रूप दिव्य हो गया।
करके पीते थे। 'राजाके बाद और कोई ऐसा नहीं
तबसे उसकी उत्तम बुद्धि भगवान् विष्णुके भजनमें लग
दिखायी देता, जो हमलोगोंका तर्पण करेगा' यह
गयी। दिव्य आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न होकर उसने
सोच-सोचकर पितर दुःखी रहते थे।
अकण्टक राज्य प्राप्त किया और पंद्रह वर्षोंतक वह
एक दिन राजा घोड़ेपर सवार हो गहन वनमें चले
उसका संचालन करता रहा। उस समय भगवान्
गये। पुरोहित आदि किसीको भी इस बातका पता न
श्रीकृष्णकी कृपासे उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न
था। मृग और पक्षियोंसे सेवित उस सघन काननमें राजा
हुआ। जब वह बड़ा हुआ, तब लुम्भकने तुरंत ही
भ्रमण करने लगे। मार्गमें कहीं सियारकी बोली सुनायी
राज्यकी ममता छोड़कर उसे पुत्रको सौंप दिया और वह
पड़ती थी तो कहीं उल्लुओंकी। जहाँ-तहाँ रीछ और मृग
भगवान् श्रीकृष्णके समीप चला गया, जहाँ जाकर
दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार घूम-घूमकर राजा
मनुष्य कभी शोकमें नहीं पड़ता। राजन् ! इस प्रकार जो
वनकी शोभा देख रहे थे, इतनेमें दोपहर हो गया।
'सफला' एकादशीका उत्तम व्रत करता है, वह इस
राजाको भूख और प्यास सताने लगी। वे जलकी खोजमें
लोकमें सुख भोगकर मरनेके पश्चात् मोक्षको प्राप्त होता
इधर-उधर दौड़ने लगे। किसी पुण्यके प्रभावसे उन्हें एक
है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो 'सफला' एकादशीके
उत्तम सरोवर दिखायी दिया, जिसके समीप मुनियोंके
व्रतमें लगे रहते हैं। उन्हींका जन्म सफल है। महाराज !
बहुत-से आश्रम थे। शोभाशाली नरेशने उन आश्रमोंकी
इसकी महिमाको पढ़ने, सुनने तथा उसके अनुसार
ओर देखा। उस समय शुभकी सूचना देनेवाले शकुन
आचरण करनेसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है।
होने लगे। राजाका दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ
युधिष्ठिर बोले- श्रीकृष्ण ! आपने शुभकारिणी
'सफला' एकादशीका वर्णन किया। अब कृपा करके
शुक्लपक्षकी एकादशीका महत्त्व बतलाइये। उसका क्या
नाम है ? कौन-सी विधि है ? तथा उसमें किस देवताका
पूजन किया जाता है ?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - राजन् ! पौषके
शुक्लपक्षकी जो एकादशी है, उसे बतलाता हूँ; सुनो।
महाराज ! संसारके हितकी इच्छासे मैं इसका वर्णन
करता हूँ। राजन् ! पूर्वोक्त विधिसे ही यत्नपूर्वक इसका
व्रत करना चाहिये। इसका नाम 'पुत्रदा' है। यह सब
पापोंको हरनेवाली उत्तम तिथि है। समस्त कामनाओं
तथा सिद्धियोंके दाता भगवान् नारायण इस तिथिके
अधिदेवता हैं। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें
इससे बढ़कर दूसरी कोई तिथि नहीं है। पूर्वकालकी
बात है, भद्रावती पुरीमें राजा सुकेतुमान् राज्य करते थे।
उनकी रानीका नाम चम्पा था। राजाको बहुत समयतक