पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * वैशाख मासकी 'वरूथिनी' और 'मोहिनी' एकादशीका माहात्म्य * ६६१
जाते हैं। अतः सर्वथा प्रयत्न करके कन्याके धनसे बचना चाहिये—उसे अपने काममें नहीं लाना चाहिये।* जो अपनी शक्तिके अनुसार आभूषणोंसे विभूषित करके पवित्र भावसे कन्याका दान करता है, उसके पुण्यकी संख्या बतानेमें चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं। वरूथिनी एकादशी करके भी मनुष्य उसीके समान फल प्राप्त करता है। व्रत करनेवाला वैष्णव पुरुष दशमी तिथिको काँस, उड़द, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु, दूसरेका अन्न, दो बार भोजन तथा मैथुन—इन दस वस्तुओंका परित्याग कर दे।† एकादशीको जुआ खेलना, नींद लेना, पान खाना, दाँतुन करना, दूसरेकी निन्दा करना, चुगली खाना, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध तथा असत्य-भाषण—इन ग्यारह बातोंको त्याग दे।‡ द्वादशीको काँस, उड़द, शराब, मधु, तेल, पतितोंसे वार्तालाप, व्यायाम, परदेश-गमन, दो बार भोजन, मैथुन, बैलकी पीठपर सवारी और मसूर—इन बारह वस्तुओंका त्याग करे।§ राजन्! इस विधिसे वरूथिनी एकादशी की जाती है। रातको जागरण करके जो भगवान् मधुसूदनका पूजन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो परमगतिको प्राप्त होते हैं। अतः पापभीरु मनुष्योंको पूर्ण प्रयत्न करके इस एकादशीका व्रत करना चाहिये। यमराजसे डरनेवाला मनुष्य अवश्य 'वरूथिनी'का व्रत करे। राजन्! इसके पढ़ने और सुननेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है और मनुष्य सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
**युधिष्ठिरने पूछा—**जनार्दन! वैशाख मासके शुक्ल-पक्षमें किस नामकी एकादशी होती है? उसका क्या फल होता है ? तथा उसके लिये कौन-सी विधि है ?
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**महाराज ! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने महर्षि वसिष्ठसे यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे पूछ रहे हो।
**श्रीरामने कहा—**भगवन् ! जो समस्त पापोंका क्षय तथा सब प्रकारके दुःखोंका निवारण करनेवाला व्रतोंमें उत्तम व्रत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।
**वसिष्ठजी बोले—**श्रीराम ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। मनुष्य तुम्हारा नाम लेनेसे ही सब पापोंसे शुद्ध हो जाता है। तथापि लोगोंके हितकी इच्छासे मैं पवित्रोंमें पवित्र उत्तम व्रतका वर्णन करूँगा। वैशाख मासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी होती है, उसका नाम मोहिनी है। वह सब पापोंको हरनेवाली और उत्तम है। उसके व्रतके प्रभावसे मनुष्य मोहजाल तथा पातक-समूहसे छुटकारा पा जाते हैं।
सरस्वती नदीके रमणीय तटपर भद्रावती नामकी सुन्दर नगरी है। वहाँ धृतिमान् नामक राजा, जो चन्द्र-वंशमें उत्पन्न और सत्यप्रतिज्ञ थे, राज्य करते थे। उसी नगरमें एक वैश्य रहता था, जो धन-धान्यसे परिपूर्ण और समृद्धिशाली था। उसका नाम था धनपाल। वह सदा पुण्यकर्ममें ही लगा रहता था। दूसरोंके लिये पौसला, कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया
* कन्यावित्तेन जीवन्ति ये नराः पापमोहिताः ॥
पुण्यक्षयात्ते गच्छन्ति निरयं यातनामयम् । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन न ग्राह्यं कन्याकाधनम् ॥
(५० । १४-१५)
† कांस्यं माषं मसूरांश्च चणकान् कोद्रवांस्तथा । शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजनमैथुने ॥
वैष्णवो व्रतकर्ता च दशम्यां दश वर्जयेत् ॥
(५० । १७-१८)
‡ द्यूतक्रीडां च निद्रां च ताम्बूलं दन्तधावनम् । परप्रवाद पैशुन्ये स्तेयं हिंसां तथा रतिम् ॥
क्रोधं चानृतवाक्यानि ह्येकादश्यां विवर्जयेत् ॥
(५० । १९-२०)
§ कांस्यं माषं सुरां क्षौद्रं तैलं पतितभाषणम् ॥
व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भोजनमैथुने । वृषपृष्ठं मसूरान्नं द्वादश्यां परिवर्जयेत् ॥
(५० । २०-२१)