पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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'संसारसागरसे तारनेवाले देवदेव हृषीकेश ! इस जलके घड़ेका दान करनेसे आप मुझे परम गतिकी प्राप्ति कराइये।'
भीमसेन ! ज्येष्ठ मासमें शुक्लपक्षकी जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिये तथा उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको शक्करके साथ जलके घड़े दान करने चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान् विष्णुके समीप पहुँचकर आनन्दका अनुभव करता है। तत्पश्चात् द्वादशीको ब्राह्मणभोजन करानेके बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्णरूपसे पापनाशिनी एकादशीका व्रत करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अनामय पदको प्राप्त होता है।
यह सुनकर भीमसेनने भी इस शुभ एकादशीका व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोकमें 'पाण्डव-द्वादशी'के नामसे विख्यात हुई।
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आषाढ़ मासकी 'योगिनी' और 'शयनी' एकादशीका माहात्म्य
**युधिष्ठिरने पूछा—**वासुदेव ! आषाढ़के कृष्णपक्षमें जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है ? कृपया उसका वर्णन कीजिये।
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**नृपश्रेष्ठ ! आषाढ़के कृष्णपक्षकी एकादशीका नाम 'योगिनी' है। यह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है। संसारसागरमें डूबे हुए प्राणियोंके लिये यह सनातन नौकाके समान है। तीनों लोकोंमें यह सारभूत व्रत है।
अलकापुरीमें राजाधिराज कुबेर रहते हैं। वे सदा भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले हैं। उनके हेममाली नामवाला एक यक्ष सेवक था, जो पूजाके लिये फूल लाया करता था। हेममालीकी पत्नी बड़ी सुन्दरी थी। उसका नाम विशालाक्षी था। वह यक्ष कामपाशमें आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नीमें आसक्त रहता था। एक दिनकी बात है, हेममाली मानसरोवरसे फूल लाकर अपने घरमें ही ठहर गया और पत्नीके प्रेमका रसास्वादन करने लगा; अतः कुबेरके भवनमें न जा सका। इधर कुबेर मन्दिरमें बैठकर शिवका पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहरतक फूल आनेकी प्रतीक्षा की। जब पूजाका समय व्यतीत हो गया तो यक्षराजने कुपित होकर सेवकोंसे पूछा—'यक्षो ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है, इस बातका पता तो लगाओ।'
**यक्षोंने कहा—**राजन् ! वह तो पत्नीकी कामनामें आसक्त हो अपनी इच्छाके अनुसार घरमें ही रमण कर रहा है।
उनकी बात सुनकर कुबेर क्रोधमें भर गये और तुरंत ही हेममालीको बुलवाया। देर हुई जानकर हेममालीके नेत्र भयसे व्याकुल हो रहे थे। वह आकर कुबेरके सामने खड़ा हुआ। उसे देखकर कुबेरकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे बोले—'ओ पापी ! ओ दुष्ट ! ओ दुराचारी ! तूने भगवान्की अवहेलना की है, अतः कोढ़से युक्त और अपनी उस प्रियतमासे वियुक्त होकर इस स्थानसे भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा।' कुबेरके ऐसा कहनेपर वह उस स्थानसे नीचे गिर गया। उस समय उसके हृदयमें महान् दुःख हो रहा था। कोढ़ोंसे सारा शरीर पीड़ित था। परन्तु शिव-पूजाके प्रभावसे उसकी स्मरण-शक्ति लुप्त नहीं होती थी। पातकसे दबा होनेपर भी वह अपने पूर्वकर्मको याद रखता था। तदनन्तर इधर-उधर घूमता हुआ वह पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुगिरिके शिखरपर गया। वहाँ उसे तपस्याके पुञ्ज मुनिवर मार्कण्डेयजीका दर्शन हुआ। पापकर्मा यक्षने दूरसे ही मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिवर मार्कण्डेयने उसे भयसे काँपते देख परोपकारकी इच्छासे निकट बुलाकर कहा—'तुझे कोढ़के रोगने कैसे दबा लिया ? तू क्यों इतना अधिक निन्दनीय जान पड़ता है ?'
**यक्ष बोला—**मुने ! मैं कुबेरका अनुचर हूँ। मेरा नाम हेममाली है। मैं प्रतिदिन मानसरोवरसे फूल ले आकर शिव-पूजाके समय कुबेरको दिया करता था। एक दिन पत्नी-सहवासके सुखमें फँस जानेके कारण मुझे