भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 693, कुल 1018 में से

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पृष्ठ 693

६७६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

आ जाती। 'प्रबोधिनी' एकादशीको एक ही उपवास कर

लेनेसे मनुष्य हजार अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञका

फल पा लेता है। बेटा ! जो दुर्लभ है, जिसकी प्राप्ति

असम्भव है तथा जिसे त्रिलोकीमें किसीने भी नहीं देखा

है; ऐसी वस्तुके लिये भी याचना करनेपर 'प्रबोधिनी'

एकादशी उसे देती है। भक्तिपूर्वक उपवास करनेपर

मनुष्योंको 'हरिबोधिनी' एकादशी ऐश्वर्य, सम्पत्ति, उत्तम

बुद्धि, राज्य तथा सुख प्रदान करती है। मेरुपर्वतके

समान जो बड़े-बड़े पाप हैं, उन सबको यह पापनाशिनी

'प्रबोधिनी' एक ही उपवाससे भस्म कर देती है। पहलेके

हजारों जन्मोंमें जो पाप किये गये हैं, उन्हें 'प्रबोधिनी' की

रात्रिका जागरण रूईकी ढेरीके समान भस्म कर डालता

है। जो लोग 'प्रबोधिनी' एकादशीका मनसे ध्यान करते

तथा जो इसके व्रतका अनुष्ठान करते हैं, उनके पितर

नरकके दुःखोंसे छुटकारा पाकर भगवान् विष्णुके

परमधामको चले जाते हैं। ब्रह्मन् ! अश्वमेध आदि

यज्ञोंसे भी जिस फलकी प्राप्ति कठिन है, वह 'प्रबोधिनी'

एकादशीको जागरण करनेसे अनायास ही मिल जाता

है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें नहाकर सुवर्ण और पृथ्वी दान

करनेसे जो फल मिलता है, वह श्रीहरिके निमित्त जागरण

करनेमात्रसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। जैसे मनुष्योंके

लिये मृत्यु अनिवार्य है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिमात्र भी

क्षणभङ्गुर है; ऐसा समझकर एकादशीका व्रत करना

चाहिये। तीनों लोकोंमें जो कोई भी तीर्थ सम्भव हैं, वे

सब 'प्रबोधिनी' एकादशीका व्रत करनेवाले मनुष्यके

घरमें मौजूद रहते हैं। कार्तिककी 'हरिबोधिनी' एकादशी

पुत्र तथा पौत्र प्रदान करनेवाली है। जो 'प्रबोधिनी'को

उपासना करता है, वही ज्ञानी है, वही योगी है, वही

तपस्वी और जितेन्द्रिय है तथा उसीको भोग और मोक्षकी

प्राप्ति होती है।

बेटा ! 'प्रबोधिनी' एकादशीको भगवान् विष्णुके

उद्देश्यसे मानव जो स्नान, दान, जप और होम करता है,

वह सब अक्षय होता है। जो मनुष्य उस तिथिको

उपवास करके भगवान् माधवकी भक्तिपूर्वक पूजा करते

हैं, वे सौ जन्मोंके पापोंसे छुटकारा पा जाते हैं।

इस व्रतके द्वारा देवेश्वर ! जनार्दनको सन्तुष्ट करके मनुष्य

सम्पूर्ण दिशाओंको अपने तेजसे प्रकाशित करता हुआ

श्रीहरिके वैकुण्ठ धामको जाता है। 'प्रबोधिनी' को

पूजित होनेपर भगवान् गोविन्द मनुष्योंके बचपन, जवानी

और बुढ़ापेमें किये हुए सौ जन्मोंके पापोंको, चाहे वे

अधिक हों या कम, धो डालते हैं। अतः सर्वथा प्रयत्न

करके सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाले देवाधिदेव

जनार्दनकी उपासना करनी चाहिये। बेटा नारद ! जो

भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर होकर कार्तिकमें पराये

अन्नका त्याग करता है, वह चान्द्रायण व्रतका फल पाता

है। जो प्रतिदिन शास्त्रीय चर्चासे मनोरञ्जन करते हुए

कार्तिक मास व्यतीत करता है, वह अपने सम्पूर्ण

पापोंको जला डालता और दस हजार यज्ञोंका फल प्राप्त

करता है। कार्तिक मासमें शास्त्रीय कथाके कहने-

सुननेसे भगवान् मधुसूदनको जैसा सन्तोष होता है, वैसा

उन्हें यज्ञ, दान अथवा जप आदिसे भी नहीं होता। जो

शुभकर्म-परायण पुरुष कार्तिक मासमें एक या आधा

श्लोक भी भगवान् विष्णुकी कथा बाँचते हैं, उन्हें सौ

गोदानका फल मिलता है। महामुने ! कार्तिकमें भगवान्

केशवके सामने शास्त्रका स्वाध्याय तथा श्रवण करना

चाहिये। मुनिश्रेष्ठ ! जो कार्तिकमें कल्याण-प्राप्तिके

लोभसे श्रीहरिकी कथाका प्रबन्ध करता है, वह अपनी

सौ पीढ़ियोंको तार देता है। जो मनुष्य सदा नियमपूर्वक

कार्तिक मासमें भगवान् विष्णुकी कथा सुनता है, उसे

सहस्र गोदानका फल मिलता है। जो 'प्रबोधिनी'

एकादशीके दिन श्रीविष्णुकी कथा श्रवण करता है, उसे

सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी दान करनेका फल प्राप्त होता

है। मुनिश्रेष्ठ ! जो भगवान् विष्णुकी कथा सुनकर अपनी

शक्तिके अनुसार कथा-वाचककी पूजा करते हैं, उन्हें

अक्षय लोककी प्राप्ति होती है। नारद ! जो मनुष्य

कार्तिक मासमें भगवत्सम्बन्धी गीत और शास्त्रविनोदके

द्वारा समय बिताता है, उसकी पुनरावृत्ति मैंने नहीं देखी

है। मुने ! जो पुण्यात्मा पुरुष भगवान्के समक्ष गान,

नृत्य, वाद्य और श्रीविष्णुकी कथा करता है, वह तीनों

लोकोंके ऊपर विराजमान होता है।

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