भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

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पृष्ठ 75
५८* अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् *[ संक्षिप्त पद्मपुराण

है, मैं शपथ करके यहाँ आयी हूँ। भूखसे पीड़ित बाघको मुझे अपना जीवन अर्पण करना है।

बछड़ा बोला—माँ! तुम जहाँ जाना चाहती हो; वहाँ मैं भी चलूँगा। तुम्हारे साथ मेरा भी मर जाना ही अच्छा है। तुम न रहोगी तो मैं अकेले भी तो मर ही जाऊँगा, [फिर साथ ही क्यों न मरूँ ?] यदि बाघ तुम्हारे साथ मुझे भी मार डालेगा तो निश्चय ही मुझको वह उत्तम गति मिलेगी, जो मातृभक्त पुत्रोंको मिला करती है। अतः मैं तुम्हारे साथ अवश्य चलूँगा। मातासे बिछुड़े हुए बालकके जीवनका क्या प्रयोजन है? केवल दूध पीकर रहनेवाले बच्चोंके लिये माताके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है। माताके समान रक्षक, माताके समान आश्रय, माताके समान स्नेह, माताके समान सुख तथा माताके समान देवता इहलोक और परलोकमें भी नहीं है। यह ब्रह्माजीका स्थापित किया हुआ परम धर्म है। जो पुत्र इसका पालन करते हैं, उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है।*

नन्दाने कहा—बेटा! मेरी ही मृत्यु नियत है, तुम वहाँ न आना। दूसरेकी मृत्युके साथ अन्य जीवोंकी मृत्यु नहीं होती [जिसकी मृत्यु नियत है, उसीकी होती है]। तुम्हारे लिये माताका यह उत्तम एवं अन्तिम सन्देश है; मेरे वचनोंका पालन करते हुए यहीं रहो, यही मेरी सबसे बड़ी शुश्रूषा है। जलके समीप अथवा वनमें विचरते हुए कभी प्रमाद न करना; प्रमादसे समस्त प्राणी नष्ट हो जाते हैं। लोभवश कभी ऐसी घासको चरनेके लिये न जाना, जो किसी दुर्गम स्थानमें उगी हो; क्योंकि लोभसे इहलोक और परलोकमें भी सबका विनाश हो जाता है। लोभसे मोहित होकर लोग समुद्रमें, घोर वनमें तथा दुर्गम स्थानोंमें भी प्रवेश कर जाते हैं। लोभके कारण विद्वान् पुरुष भी भयंकर पाप कर बैठता है। लोभ, प्रमाद तथा हर एकके प्रति विश्वास कर लेना—इन तीन कारणोंसे जगत्‌का नाश होता है; अतः इन तीनों दोषोंका परित्याग करना चाहिये। बेटा! सम्पूर्ण शिकारी जीवोंसे तथा म्लेच्छ और चोर आदिके द्वारा संकट प्राप्त होनेपर सदा प्रयत्नपूर्वक अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये। पापयोनिवाले पशु-पक्षी अपने साथ एक स्थानपर निवास करते हों, तो भी उनके विपरीत चित्तका सहसा पता नहीं लगता। नखवाले जीवोंका, नदियोंका, सींगवाले पशुओंका, शस्त्र धारण करनेवालोंका, स्त्रियोंका तथा दूतोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। जिसपर पहले कभी विश्वास नहीं किया गया हो, ऐसे पुरुषपर तो विश्वास करे ही नहीं, जिसपर विश्वास जम गया हो, उसपर भी अत्यन्त विश्वास न करे, क्योंकि [अविश्वसनीयपर] विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह विश्वास करनेवालेका समूल नाश कर डालता है। औरोंकी तो बात ही क्या है, अपने शरीरका भी विश्वास नहीं करना चाहिये। भीरुस्वभाववाले बालकका भी विश्वास न करे; क्योंकि बालक डराने-धमकानेपर प्रमादवश गुप्त बात भी दूसरोंको बता सकते हैं।† सर्वत्र और सदा सूँघते हुए


* नास्ति मातृसमो नाथो नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमः स्नेहो नास्ति मातृसमं सुखम्॥
नास्ति मातृसमो देव इहलोके परत्र च।
एवं वै परमं धर्मं प्रजापतिविनिर्मितम्। ये तिष्ठन्ति सदा पुत्रास्ते यान्ति परमां गतिम्॥
(१८। ३५३-५४)

† समुद्रमटवीं दुर्गं विशन्ते लोभमोहिताः। लोभादकार्यमत्युग्रं विद्वानपि समाचरेत्॥
लोभात्प्रमादाद्विश्वासात्त्रिविधैः क्षीयते जगत्। तस्माल्लोभं न कुर्वीत न प्रमादं न विश्वसेत्॥
आत्मा हि सततं पुत्र रक्षणीयः प्रयत्नतः। सर्वैभ्यः श्वापदेभ्यश्च म्लेच्छचौरारिसङ्कटे॥
तिरश्चां पापयोनीनामेकत्र वसतामपि। विपरीतानि चित्तानि विज्ञायन्ते न पुत्रक॥
नखिनां च नदीनां च शृङ्गिणां शस्त्रधारिणाम्। विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीणां प्रेष्यजनस्य च॥
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्। विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलादपि निकृन्तति॥
न विश्वसेत् स्वदेहेऽपि बालेऽप्याभीतचेतसि। वक्ष्यन्ति गूढमप्यर्थं सुप्रमत्ते प्रमादतः॥
(१८। ३५९—६५)

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