भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 755

७३८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [संक्षिप्त पद्मपुराण


वस्तुओंसे भिन्नरूपमें स्थित माना गया है, वह परमात्मा ही आगमका दूसरा लक्षण है। तात्पर्य यह कि साधन-भूत ज्ञान और साध्यस्वरूप ज्ञेय दोनों ही आगम हैं। वह ज्ञेय परमात्मा योगियोंद्वारा ध्यान करनेयोग्य है। परमार्थसे विमुख मनुष्योंद्वारा उसका ज्ञान होना असम्भव है। भिन्न-भिन्न बुद्धियोंसे वह यद्यपि भिन्न-सा लक्षित होता है, तथापि आत्मासे भिन्न नहीं है। तात पुण्डरीक ! ध्यान देकर सुनो। सुव्रत ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मेरे पूछनेपर जिस तत्त्वका उपदेश किया था, वही तुम्हें बतलाता हूँ। एक समय अज, अविनाशी पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमें विराजमान थे। उस समय मैंने विधिपूर्वक उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा—'ब्रह्मन् ! कौन-सा ज्ञान सबसे उत्तम बताया गया है? तथा कौन-सा योग सर्वश्रेष्ठ माना गया है? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये।'

ब्रह्माजीने कहा— तात ! सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका श्रवण करो। यह थोड़े-से वाक्योंमें कहा गया है, किन्तु इसका अर्थ बहुत विस्तृत है। इसकी उपासनामें कोई क्लेश या परिश्रम नहीं है। जिन्हें गुरु-परम्परासे पञ्चविंशक¹ पुरुष बतलाया गया है, वे ही सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं; इसलिये उन्हींको सम्पूर्ण जगत्‌के निवासरूप सनातन परमात्मा नारायण कहा जाता है। वे ही संसारकी सृष्टि, संहार और पालनमें लगे रहते हैं। ब्रह्मन् ! ब्रह्मा, शिव और विष्णु—इन तीनों रूपोंमें एक ही देवाधिदेव सनातन पुरुष विराज रहे हैं। अपना हित चाहनेवाले पुरुषको सदा उन्हींकी आराधना करनी चाहिये। जो निःस्पृह, नित्य संतुष्ट, ज्ञानी, जितेन्द्रिय, ममता-अहङ्कारसे रहित, राग-द्वेषसे शून्य, शान्तचित्त और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे पृथक् हो ध्यानयोगमें प्रवृत्त रहते हैं, वे ही उन अक्षय जगदीश्वरको देखते और प्राप्त करते हैं। जो लोग भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण कर चुके हैं तथा जिनके मन-प्राण उन्हींके चिन्तनमें लगे हैं, वे ही ज्ञानदृष्टिसे संसारकी वर्तमान अवस्थाको, कालान्तरमें होनेवाली अवस्थाको, भूत, भविष्य, वर्तमान और दूरको, स्थूल और सूक्ष्मको तथा अन्य ज्ञातव्य बातोंको यथार्थरूपसे देख पाते हैं। इसके विपरीत जिनकी बुद्धि मन्द और अन्तःकरण दूषित है तथा जिनका स्वभाव कुतर्क और अज्ञानसे दुष्ट हो रहा है, ऐसे लोगोंको सब कुछ उलटा ही प्रतीत होता है।

नारदजी कहते हैं— पुण्डरीक ! अब मैं दूसरा प्रसङ्ग सुनाता हूँ, इसे भी सुनो। पूर्वकालमें जगत्के कारणभूत ब्रह्माजीने ही इसका भी उपदेश किया था। एक बार इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा ऋषियोंके पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्माजीने उनके हितकी बात इस प्रकार बतायी थी।

ब्रह्माजीने कहा— देवताओ ! भगवान् नारायण ही सबके आश्रय हैं। सनातन लोक, यज्ञ तथा नाना प्रकारके शास्त्रोंका भी पर्यवसान नारायणमें ही होता है। छहों अङ्गोंसहित वेद तथा अन्य आगम सर्वव्यापी


१. पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियोंके विषय, मन, पाँच भूत, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति—ये चौबीस तत्त्व हैं, इनसे भिन्न सर्वज्ञ परमात्मा पचीसवाँ तत्त्व है; इसलिये वह 'पञ्चविंशक' कहलाता है।