पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * श्रीविष्णुकी महिमा-भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा * ७४१
गदा शोभा पा रहे थे। तेजोमयी आकृति, कमलके समान बड़े-बड़े नेत्र और चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् मुख। कमरमें करधनी, कानोंमें कुण्डल, गलेमें हार, बाहुओंमें भुजबन्द, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न और श्याम शरीरपर पीतवस्त्र शोभा पा रहे थे। भगवान् कौस्तुभमणिसे विभूषित थे। वनमालासे उनका सारा अङ्ग व्याप्त था। मकराकृत कुण्डल जगमगा रहे थे। चमकते हुए यज्ञोपवीत और नीचेतक लटकती हुई मोतियोंकी मालासे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। देव, सिद्ध, देवेन्द्र, गन्धर्व और मुनि चँवर तथा व्यजन आदिसे भगवान्की सेवा कर रहे थे। पापरहित पुण्डरीकने स्वयं उन देवदेवेश्वर महात्मा जनार्दनको वहाँ उपस्थित देख पहचान लिया और प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़ प्रणाम करके स्तुति करना आरम्भ किया।
**पुण्डरीक बोले—**सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप निरञ्जन (निर्मल), नित्य, निर्गुण एवं महात्मा हैं; आपको नमस्कार है। आप समस्त प्राणियोंके ईश्वर हैं भक्तोंका भय एवं पीड़ा दूर करनेके लिये गोविन्द तथा गरुडध्वज-रूप धारण करते हैं। जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये अनेक आकार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपमें ही स्थित है। केवल आप ही इसके उपादान कारण हैं। आपने ही जगत्का निर्माण किया है। नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले आप भगवान् पद्मनाभको बारंबार नमस्कार है। समस्त वेदान्तोंमें जिनकी आत्मविभूतिका ही श्रवण किया जाता है, उन परमेश्वरको नमस्कार है। नारायण! आप ही सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी और जगत्के कारण हैं। मेरे हृदय-मन्दिरमें निवास करनेवाले भगवान् शङ्ख-चक्र-गदाधर! मुझपर प्रसन्न होइये। समस्त प्राणियोंके आदिभूत, इस पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी तथा सबकी उत्पत्तिके कारण श्रीविष्णुको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवता और सुरेश्वर भी जिनकी महिमाको नहीं जानते, जिनकी महिमाका तपस्यासे ही अनुमान हो सकता है, उन परमात्माको नमस्कार है। भगवन्! आपकी महिमा वाणीका विषय नहीं है, उसे कहना असम्भव है। आप जाति आदिकी कल्पनासे दूर हैं, अतः सदा तत्त्वतः ध्यान करनेके योग्य हैं। पुरुषोत्तम! आप एक—अद्वितीय होते हुए भी भक्तोंपर कृपा करनेके लिये भेदरूपसे मत्स्य-कूर्म आदि अवतार धारण करके दर्शन देते हैं।
**भीष्मजी कहते हैं—**इस प्रकार जगत्के स्वामी वीरवर भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करके पुण्डरीक उन्हींको निहारने लगे; क्योंकि चिरकालसे वे उनके दर्शनकी लालसा रखते थे। तब तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले तथा नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले भगवान् विष्णुने महाभाग पुण्डरीकसे गम्भीर वाणीमें कहा—'बेटा पुण्डरीक! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। महामते! तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, उसे वरके रूपमें माँगो। मैं अवश्य दूँगा।'
**पुण्डरीक बोले—**देवेश्वर! कहाँ मैं अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला मनुष्य और कहाँ मेरे परम हितैषी आप। माधव! जिसमें मेरा हित हो, उसे आप ही दीजिये।
पुण्डरीकके यों कहनेपर भगवान् अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—'सुव्रत! तुम्हारा कल्याण हो। आओ, मेरे ही साथ चलो। तुम मेरे परम उपकारी और सदा मुझमें ही मन लगाये रखनेवाले हो; अतः सर्वदा मेरे साथ ही रहो।'
**भीष्मजी कहते हैं—**भक्तवत्सल भगवान् श्रीधरने प्रसन्नतापूर्वक जब इस प्रकार कहा, उसी समय आकाशमें देवताओंकी दुंदुभी बज उठी और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्मा आदि देवता साधुवाद देने लगे। सिद्ध, गन्धर्व और किन्नर गान करने लगे। समस्त लोकोंद्वारा वन्दित देवदेव जगदीश्वरने वहीं पुण्डरीकको अपने साथ ले लिया और गरुड़पर आरूढ़ हो वे परम धामको चले गये; इसलिये राजेन्द्र युधिष्ठिर!