पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * श्रीगङ्गाजीकी महिमा तथा श्रीविष्णु-प्रतिमाके पूजनका माहात्म्य * ७४३
कौन-कौन-से हैं?'
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास बतलाया जाता है, जिसमें शिल और उञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणका किसी सिद्ध पुरुषके साथ हुए संवादका वर्णन है। कोई सिद्ध पुरुष समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करके किसी उञ्छवृत्तिवाले महात्मा गृहस्थके घर गये। वे आत्मविद्याके तत्त्वज्ञ, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखनेवाले, राग-द्वेषसे रहित, ज्ञान-कर्ममें कुशल, वैष्णवोंमें श्रेष्ठ, वैष्णव-धर्मके पालनमें तत्पर, वैष्णवोंकी निन्दासे दूर रहनेवाले, योगाभ्यासी, त्रिकालपूजाके तत्त्वज्ञ, वेदविद्यामें निपुण, धर्माधर्मका विचार करनेवाले, नित्य नियमपूर्वक वेदपाठ करनेवाले और सदा अतिथिपूजामें तत्पर रहनेवाले थे। सिद्ध पुरुषको आया देख गृहस्थने उनका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया। तत्पश्चात् उनसे पूछा— द्विजवर ! कौन-कौनसे देश, पर्वत और आश्रम पवित्र हैं? मुझे प्रेमपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।
सिद्ध पुरुषने कहा— ब्रह्मन् ! जिनके बीच नदियोंमें श्रेष्ठ त्रिपथगा गङ्गाजी सदा बहती रहती हैं, वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही पर्वत और वे ही आश्रम परम पवित्र हैं। जीव गङ्गाजीका सेवन करके जिस गतिको प्राप्त करता है, उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागसे भी नहीं पा सकता।* अपने मनको संयममें रखनेवाले पुरुषोंको गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे जो संतोष होता है, वह सौ यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी नहीं हो सकता। जैसे सूर्य उदयकालमें तीव्र अन्धकारका नाश करके तेजसे उद्भासित हो उठता है, उसी प्रकार गङ्गाजीके जलमें डुबकी लगानेवाला मनुष्य पापोंका नाश करके पुण्यसे प्रकाशमान होने लगता है। विप्र ! जैसे आगका संयोग पाकर रूईका ढेर जल जाता है, उसी प्रकार गङ्गाका स्नान मनुष्यके सारे पापोंको दूर कर देता है।† जो मनुष्य सूर्यकी किरणोंसे तपे हुए गङ्गाजलका पान करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुरुष एक पैरसे खड़ा होकर एक हजार चान्द्रायण व्रतोंका अनुष्ठान करता है और जो केवल गङ्गाजीके जलमें डुबकी लगाता है—इन दोनोंमें डुबकी लगानेवाला मनुष्य ही श्रेष्ठ है। जो दस हजार वर्षोंतक नीचे सिर करके लटका रहता है, उसकी अपेक्षा भी वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो एक मास भी गङ्गाजलका सेवन कर लेता है। नरश्रेष्ठ ! गङ्गाजीमें स्नान करके मनुष्य देहत्यागके पश्चात् तुरंत वैकुण्ठमें चला जाता है। जो सौ योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा'का उच्चारण करता है, वह
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ॥
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ (८१।१६३—१६५)
* तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः। गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ॥ (८२। २४)
† अपहृत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः। तथापहृत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलाप्लुतः ॥
अग्निं प्राप्य यथा विप्र तूलराशिविनश्यति। तथा गङ्गावगाह्य सर्वपापं व्यपोहति ॥ (८२। २६-२७)