पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
तिगुना करके उसे जलसे धोना चाहिये। फिर यदि शिवलिङ्गके लिये बनाना हो तो उस लिङ्गके बराबर अथवा किसी प्रतिमाके लिये बनाना हो तो उस प्रतिमाके सिरसे लेकर पैरतकका या घुटनेतकका या नाभिके बराबरतकका पवित्रक बनाना चाहिये। इनमें पहला उत्तम, दूसरा मध्यम और तीसरा लघु श्रेणीका है। एक सालमें जितने दिन हों, उतनी संख्यामें या उसके आधी संख्यामें अथवा एक सौ आठकी संख्यामें सूतसे ही उस पवित्रकमें गाँठें लगानी चाहिये। पार्वती ! चौवनकी संख्यामें भी गाँठें लगायी जा सकती हैं। विष्णुप्रतिमाके लिये जो पवित्रक बने; उसे वनमालाके आकारका बना लेना चाहिये। जैसे भी शोभा हो, वह उपाय करना चाहिये। इससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। पवित्रक तैयार होनेके पश्चात् भगवान्को अर्पण करना चाहिये।
पार्वती ! कुबेरके लिये पवित्रारोपण करनेकी तिथि प्रतिपदा बतायी गयी है। लक्ष्मीदेवीके लिये द्वितीया सब तिथियोंमें उत्तम है। तुम्हारे लिये तृतीया बतायी गयी है और गणेशके लिये चतुर्थी। चन्द्रमाके लिये पञ्चमी, कार्तिकेयके लिये षष्ठी, सूर्यके लिये सप्तमी, दुर्गाके लिये अष्टमी, मातृवर्गके लिये नवमी, यमराजके लिये दशमी, अन्य सब देवताओंके लिये एकादशी, लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके लिये द्वादशी, कामदेवके लिये त्रयोदशी, मेरे लिये चतुर्दशी तथा ब्रह्माजीके लिये पवित्रकसे पूजन करनेके निमित्त पूर्णिमा तिथि बतायी गयी है। ये भिन्न-भिन्न देवताओंके लिये पवित्रारोपणके योग्य तिथियाँ कही गयी हैं। लघु श्रेणीके पवित्रकमें बारह, मध्यम श्रेणीके पवित्रकमें चौबीस और उत्तम श्रेणीके पवित्रकमें छत्तीस ग्रन्थियाँ कम-से-कम होनी चाहिये। सब पवित्रकोंको कपूर और केसर अथवा चन्दन और हल्दीमें रँगकर बाँसके नये पात्रमें रखना चाहिये और जहाँ भगवान्का पूजन हो, वहाँ उन सबको देवताकी भाँति स्थापित करना चाहिये। पहले देवताकी पूजा करके फिर उन्हें पवित्रकोंमें अधिवासित करना चाहिये। पवित्रकमें अधिवास हो जानेपर पुनः पूजन करना उचित है। पवित्रकोंमें जो देवता अधिवास करते हैं, उनका आगे बतायी जानेवाली विधिसे संनिधीकरण (समीपतास्थापन) करना चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—ये तीन सूत्रोंके देवता हैं तथा क्रिया, पौरुषी, वीरा, अपराजिता, जया, विजया, मुक्तिदा, सदाशिवा, मनोन्मनी और सर्वतोमुखी—ये दस ग्रन्थियोंकी अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। इन सबका सूत्रोंमें आवाहन करना चाहिये। शास्त्रोक्त विधिसे मुद्राद्वारा आवाहन करे। सबका आवाहन करके संनिधीकरणकी क्रिया करे।
मुद्राद्वारा समीपता स्थापित करनेका नाम संनिधी-करण है। पहले रक्षामुद्रासे संरक्षण करके धेनुमुद्राके द्वारा उन्हें अमृतस्वरूप बनाये। फिर सबसे पहले भगवान्के आगे कलशका जल लेकर 'क्लीं कृष्णाय' इस मन्त्रसे उन पवित्रकोंका प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल आदि निवेदन करके षोडशोपचार आदिसे पवित्रकके देवताओंका पूजन करे। फिर उन्हें धूप देकर देवताके सम्मुख हो नमस्कारमुद्राके द्वारा देवताको अभिमन्त्रित करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—
आमन्त्रितो महादेव सार्धं देव्या गणादिभिः ।
मन्त्रैर्वा लोकपालैश्च सहितः परिचारकैः ॥
आगच्छ भगवन् विष्णो विधेः सम्पूर्तिहेतवे ।
प्रातस्त्वत्पूजनं कुर्मः सांनिध्यं नियतं कुरु ॥
(८८। २९-३०)
'महान् देवता भगवान् विष्णु ! मन्त्रोंद्वारा आवाहन करनेपर आप देवी लक्ष्मी, पार्षद, लोकपाल और परिचारकोंके साथ विधिकी पूर्तिके लिये यहाँ पधारिये। प्रातःकालमें आपकी पूजा करूँगा। यहाँ निश्चितरूपसे सन्निकटता स्थापित कीजिये।'
तदनन्तर वह गन्ध और पवित्रक भगवान् राघवके अथवा श्रीविष्णुके चरणोंके समीप रख दे, फिर प्रातः-काल नित्यकर्म करके पुण्याह और स्वस्तिवाचन कराये तथा भगवान्की जय-जयकारके साथ घण्टा आदि बाजे और तुरही आदि बजाते हुए पवित्रकोंद्वारा पूजन करे।
'ॐ वासुदेवाय विद्महे, विष्णुदेवाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात्।'