पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
बहुत ऊँचे हो गये थे [यहाँतक कि उन्होंने सूर्यका मार्ग भी रोक लिया था], किन्तु सत्यमें बँध जानेके कारण ही वे [महर्षि अगस्त्यके साथ किये गये] अपने नियमको नहीं तोड़ते। स्वर्ग, मोक्ष तथा धर्म—सब सत्यमें ही प्रतिष्ठित हैं; जो अपने वचनका लोप करता है, उसने मानो सबका लोप कर दिया। सत्य अगाध जलसे भरा हुआ तीर्थ है, जो उस शुद्ध सत्यमय तीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है। एक हजार अश्वमेध यज्ञ और सत्यभाषण—ये दोनों यदि तराजूपर रखे जायँ तो एक हजार अश्वमेध यज्ञोंसे सत्यका ही पलड़ा भारी रहेगा। सत्य ही उत्तम तप है, सत्य ही उत्कृष्ट शास्त्रज्ञान है। सत्यभाषणमें किसी प्रकारका क्लेश नहीं है। सत्य ही साधुपुरुषोंकी परखके लिये कसौटी है। वही सत्पुरुषोंकी वंश-परम्परागत सम्पत्ति है। सम्पूर्ण आश्रयोंमें सत्यका ही आश्रय श्रेष्ठ माना गया है। वह अत्यन्त कठिन होनेपर भी उसका पालन करना अपने हाथमें है। सत्य सम्पूर्ण जगत्के लिये आभूषणरूप है। जिस सत्यका उच्चारण करके म्लेच्छ भी स्वर्गमें पहुँच जाता है, उसका परित्याग कैसे किया जा सकता है।*
सखियाँ बोलीं— नन्दे ! तुम सम्पूर्ण देवताओं और दैत्योंके द्वारा नमस्कार करनेयोग्य हो; क्योंकि तुम परम सत्यका आश्रय लेकर अपने प्राणोंका भी त्याग कर रही हो, जिनका त्याग बड़ा ही कठिन है। कल्याणी ! इस विषयमें हमलोग क्या कह सकती हैं। तुम तो धर्मका बीड़ा उठा रही हो। इस सत्यके प्रभावसे त्रिभुवनमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। इस महान् त्यागसे हमलोग यही समझती हैं कि तुम्हारा अपने पुत्रके साथ वियोग नहीं होगा। जिस नारीका चित्त कल्याणमार्गमें लगा हुआ है, उसपर कभी आपत्तियाँ नहीं आतीं।
पुलस्त्यजी कहते हैं— तदनन्तर गोपियोंसे मिलकर तथा समस्त गो-समुदायकी परिक्रमा करके वहाँके देवताओं और वृक्षोंसे विदा ले नन्दा वहाँसे चल पड़ी। उसने पृथ्वी, वरुण, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, दसों दिक्पाल, वनके वृक्ष, आकाशके नक्षत्र तथा ग्रह—इन सबको बारम्बार प्रणाम करके कहा—'इस वनमें जो सिद्ध और वनदेवता निवास करते हैं, वे वनमें चरते हुए मेरे पुत्रकी रक्षा करें।' इस प्रकार पुत्रके स्नेहवश बहुत-सी बातें कहकर नन्दा वहाँसे प्रस्थित हुई और उस स्थानपर पहुँची, जहाँ वह तीखी दाढ़ों और भयङ्कर आकृतिवाला मांसभक्षी बाघ मुँह बाये बैठा था। उसके पहुँचनेके साथ ही उसका बछड़ा भी अपनी पूँछ ऊपरको उठाये अत्यन्त वेगसे दौड़ता हुआ वहाँ आ गया और
* एकः संश्लिष्यते गर्भे मरणे भरणे तथा। भुङ्क्ते चैकः सुखं दुःखमतः सत्यं वदाम्यहम्॥
सत्ये प्रतिष्ठिता लोका धर्मः सत्ये प्रतिष्ठितः। उदधिः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलङ्घति॥
विष्णवे पृथिवीं दत्त्वा बलिः पातालमास्थितः। छद्मनापि बलिर्बद्धः सत्यवाक्येन तिष्ठति॥
प्रवर्द्धमानः शैलेन्द्रः शतशृङ्गः समुच्छ्रितः। सत्येन संस्थितो विन्ध्यः प्रबन्धं नातिवर्तते॥
स्वर्गो मोक्षस्तथा धर्मः सर्वे वाचि प्रतिष्ठिताः। यस्तां लोपयते वाचमशेषं तेन लोपितम्॥
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अगाधसलिले शुद्धे सत्यतीर्थे क्षमाह्रदे। स्नात्वा पापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमां गतिम्॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते॥
सत्यं साधु तपः श्रुतं च परमं क्लेशादिभिर्वर्जितं साधूनां निकषं सतां कुलधनं सर्वाश्रयाणां वरम्।
स्वाधीनं च सुदुर्लभं च जगतः साधारणं भूषणं यन्म्लेच्छोऽप्यभिधाय गच्छति दिवं तत्त्यज्यते वा कथम्॥
(१८। ३९५—३९९, ४०३-४०४)