भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 781

७६४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


अधिकार नहीं है। तथापि तुम्हारी ग्लानि देखकर मेरे मनमें

बड़ा दुःख हो रहा है। तुम दुःखिनी हो, तुम्हारा उद्धार किये

बिना मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिलेगी; अतः मैंने जन्मसे

लेकर आजतक जो कार्तिक-व्रतका अनुष्ठान किया है,

उसका आधा पुण्य लेकर तुम उत्तम गतिको प्राप्त होओ।

यों कहकर धर्मदत्तने द्वादशाक्षर मन्त्रका श्रवण

कराते हुए तुलसीमिश्रित जलसे ज्यों ही उसका अभिषेक

किया, त्यों ही वह प्रेत-शरीरसे मुक्त हो दिव्यरूपधारिणी

देवी हो गयी। धधकती हुई आगकी ज्वालाके समान

तेजस्विनी दिखायी देने लगी। लावण्यसे तो वह ऐसी

जान पड़ती थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी हों। तदनन्तर उसने

भूमिपर मस्तक टेककर ब्राह्मणदेवताको प्रणाम किया

और आनन्दविभोर हो गद्गदवाणीमें कहा-

'द्विजश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मैं नरकसे छुटकारा पा

गयी। मैं पापके समुद्रमें डूब रही थी, आप मेरे लिये

नौकाके समान हो गये।'

वह इस प्रकार ब्राह्मणदेवसे वार्तालाप कर ही रही थी

कि आकाशसे एक तेजस्वी विमान उतरता दिखायी दिया।

वह श्रीविष्णुके समान रूप धारण करनेवाले पार्षदोंसे युक्त

था। पास आनेपर विमानके द्वारपर खड़े हुए पुण्यशील

और सुशील नामक पार्षदोंने उस देवीको विमानपर चढ़ा

लिया। उस समय उस विमानको देखकर धर्मदत्तको बड़ा

विस्मय हुआ। उन्होंने श्रीविष्णुरूपधारी पार्षदोंका दर्शन

करके उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। ब्राह्मणको प्रणाम करते

देख पुण्यशील और सुशीलने उन्हें उठाया और उनकी

प्रशंसा करते हुए यह धर्मयुक्त वचन कहा।

दोनों पार्षद बोले- द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हें धन्यवाद

है। क्योंकि तुम सदा भगवान् विष्णुकी आराधनामें

संलग्न रहते हो। दीनोंपर दया करनेका तुम्हारा स्वभाव

है। तुम धर्मात्मा और श्रीविष्णुव्रतका अनुष्ठान करनेवाले

हो। तुमने बचपनसे लेकर अबतक जो कल्याणमय

कार्तिकका व्रत किया है, उसके आधेका दान करके दूना

पुण्य प्राप्त कर लिया है। तुम बड़े दयालु हो, तुम्हारे द्वारा

दान किये हुए कार्तिक-व्रतके अङ्गभूत तुलसीपूजन

आदि शुभ कर्मोंके फलसे यह स्त्री आज भगवान्

विष्णुके समीप जा रही है। तुम भी इस शरीरका अन्त

होनेपर अपनी दोनों पत्नियोंके साथ भगवान् विष्णुके

वैकुण्ठधाममें जाओगे और उन्हींके समान रूप धारण

करके सदा उनके समीपं निवास करोगे। धर्मदत्त ! जिन

लोगोंने तुम्हारी ही भाँति श्रीविष्णुकी भक्तिपूर्वक

आराधना की है, वे धन्य और कृतकृत्य हैं; तथा संसारमें

उन्हींका जन्म लेना सार्थक है। जिन्होंने पूर्वकालमें राजा

उत्तानपादके पुत्र ध्रुवको ध्रुवपदपर स्थापित किया था,

उन श्रीविष्णुकी यदि भलीभाँति आराधना की जाय तो वे

प्राणियोंको क्या नहीं दे डालते। भगवान्‌के नामोंका

स्मरण करने मात्रसे देहधारी जीव सद्गतिको प्राप्त हो

जाते हैं। पूर्वकालमें जब गजराजको ग्राहने पकड़ लिया

था, उस समय उसने श्रीहरिके नामस्मरणसे ही संकटसे

छुटकारा पाकर भगवान्‌की समीपता प्राप्त की थी और

वही अब भगवान्‌का 'जय' नामसे प्रसिद्ध पार्षद है।

तुमने भी श्रीहरिकी आराधना की है, अतः वे तुम्हें अपने

समीप अवश्य स्थान देंगे।