भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 801

७८४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण *************************************************************************************

महादेवजी कहते हैं— यह मोक्षदायक शास्त्र अनधिकारी पुरुषोंके सामने प्रकाशित करनेयोग्य नहीं है। जो मनुष्य इसका श्रवण करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है। कार्तिकेय ! इस व्रतको यत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। जो त्यागी मनुष्य हैं, वे भी यदि इस व्रतका अनुष्ठान करें तो उनके पुण्यको बतलानेमें मैं असमर्थ हूँ। इस प्रकार कार्तिक मासका जो कुछ भी फल है, वह सब मैंने बतला दिया।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— देवदेव भगवान् शङ्करने पुत्रकी मङ्गल-कामनासे यह व्रत उसे बताया था। पिताके वचन सुनकर कार्तिकेय आनन्दमग्न हो गये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कार्तिकमाहात्म्यका पाठ करता, सुनता और सुनकर हृदयमें धारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इस माहात्म्यका श्रवण करनेमात्रसे ही धन, धान्य, यश, पुत्र, आयु और आरोग्यकी प्राप्ति हो जाती है।


भक्तिका स्वरूप, शालग्रामशिलाकी महिमा तथा वैष्णवपुरुषोंका माहात्म्य

श्रीपार्वतीजीने पूछा— प्रभो ! विश्वेश्वर ! श्रेष्ठ भक्तिका क्या स्वरूप है, जिसके जाननेमात्रसे मनुष्योंको सुख प्राप्त होता है ?

महादेवजी बोले— देवि ! भक्ति तीन प्रकारकी बतायी गयी है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। इनमें सात्त्विकी उत्तम, राजसी मध्यम और तामसी कनिष्ठ है। मोक्षरूप फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको श्रीहरिकी उत्तम भक्ति करनी चाहिये। अहङ्कारको लेकर या दूसरोंको दिखानेके लिये अथवा ईर्ष्यावश या दूसरोंका संहार करनेकी इच्छासे जो किसी देवताकी भक्ति की जाती है, वह तामसी बतायी गयी है। जो विषयोंकी इच्छा रखकर अथवा यश और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये भगवान्की पूजा करता है, उसकी भक्ति राजसी मानी गयी है। ज्ञान-परायण ब्राह्मणोंको कर्म-बन्धनका नाश करनेके लिये श्रीविष्णुके प्रति आत्मसमर्पणकी बुद्धि करनी चाहिये। यही सात्त्विकी भक्ति है। अतः देवि ! सदा सब प्रकारसे श्रीहरिका सेवन करना चाहिये। तामसभावसे तामस, राजससे राजस और सात्त्विकसे सात्त्विक गति प्राप्त होती है। भगवान् गोविन्दमें भक्ति रखनेवाले पुरुषोंको समस्त देवता प्रसन्नतापूर्वक शान्ति देते हैं, ब्रह्मा आदि देवेश्वर उनका मङ्गल करते हैं और प्रधान-प्रधान मुनीश्वर उन्हें कल्याण प्रदान करते हैं। जो भगवान् गोविन्दमें भक्ति रखते हैं, उनके लिये भूत-पिशाचोंसहित समस्त ग्रह शुभ हो जाते हैं। ब्रह्मा आदि देवता उनपर प्रसन्न होते हैं तथा उनके घरोंमें लक्ष्मी सदा स्थिर रहती है। भगवान् गोविन्दमें भक्ति रखनेवाले मानवोंके शरीरमें सदा गङ्गा, गया, नैमिषारण्य, काशी, प्रयाग और कुरुक्षेत्र आदि तीर्थ निवास करते हैं।*

इस प्रकार विद्वान् पुरुष भगवती लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी आराधना करे। जो ऐसा करता है, वह ब्राह्मण सदा कृतकृत्य होता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। पार्वती ! क्षत्रिय वैश्य अथवा शूद्र ही क्यों न हो—जो भगवान् विष्णुकी विशेषरूपसे भक्ति करता है, वह निस्सन्देह मुक्त हो जाता है।†

पार्वतीजीने पूछा— सुरेश्वर ! इस पृथ्वीपर शालग्रामशिलाकी विशुद्ध मूर्तियाँ बहुत-सी हैं, उनमेंसे कितनी मूर्तियोंको पूजनमें ग्रहण करना चाहिये।

महादेवजी बोले— देवि ! जहाँ शालग्राम-शिलाकी कल्याणमयी मूर्ति सदा विराजमान रहती है, उस घरको वेदोंमें सब तीर्थोंसे श्रेष्ठ बताया गया है। ब्राह्मणोंको पाँच, क्षत्रियोंको चार, वैश्योंको तीन और शूद्रोंको एक ही शालग्राममूर्तिका यत्नपूर्वक पूजन करना


* गङ्गागयानैमिषपुष्कराणि काशी प्रयागः कुरुजाङ्गलानि। तिष्ठन्ति देहे कृतभक्तिपूर्वे गोविन्दभक्तिं वहतां नराणाम्॥ (१२६। १७)
† क्षत्रियो वाऽथ वैश्यो वा शूद्रो वा सुरसत्तमे। भक्तिं कुर्वन् विशेषेण मुक्तिं याति न संशयः॥ (१२६। १९)