भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 820

उत्तरखण्ड ] * साभ्रमती-तटके बालार्क, दुर्धर्षेश्वर तथा खड्गधार आदि तीर्थोंकी महिमाका वर्णन * ८०३


उसका नामोच्चारणमात्रसे मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे भी छुटकारा पा जाता है। साभ्रमती नदीका जल जहाँ पूर्वसे पश्चिमकी ओर बहता है, वह स्थान प्रयागसे भी अधिक पवित्र, समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और महान् है। वहाँ ब्राह्मणोंको दिया हुआ गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न, शय्या, भोजन, वाहन और छत्र आदिका दान, अग्निमें किया हुआ हवन, पितरोंके लिये किया गया श्राद्ध तथा जप आदि कर्म अक्षय हो जाता है। उस तीर्थमें मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, वह-वह उसे महेश्वरकी कृपा तथा तीर्थके प्रभावसे प्राप्त होती है।

अब दुर्धर्षेश्वर नामक एक दूसरे उत्तम तीर्थका वर्णन करता हूँ। उसके स्मरण करनेमात्रसे पापी भी पुण्यवान् हो जाता है। देवासुर-संग्रामकी समाप्ति और दैत्योंका संहार हो जानेपर भृगुनन्दन शुक्राचार्यने वहाँ कठोर व्रतका पालन करके लोक-सृष्टिके कारणभूत दुर्धर्ष देवता महादेवजीकी समाराधना की और उनसे दैत्योंके जीवनके लिये मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की। तबसे यह तीर्थ भूमण्डलमें उन्हींके नामपर विख्यात हुआ। काव्यतीर्थमें स्नान करके दुर्धर्षेश्वर नामक महादेवका पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है।

साभ्रमती नदीके तटपर खड्गधार नामसे विख्यात एक परम पावन तीर्थ है, जो अब गुप्त हो गया है और जहाँ प्रसङ्गवश भी कभी अचानक स्नान और जलपान कर लेनेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँ कश्यपके पीछे जाती हुई पवित्र साभ्रमती नदीको पातालकी ओर जाते देख रुद्रने उसे अपने जटाजूटमें धारण कर लिया तथा वे रुद्र खड्गधार नामसे विख्यात होकर वहीं रहने लगे। देवेश्वरि ! वहाँ स्नान करनेसे पापी भी स्वर्गमें चले जाते हैं। पार्वती ! माघमें, वैशाखमें तथा विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको जो वहाँ स्नान करते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं। वसिष्ठ, वामदेव, भारद्वाज और गौतम आदि ऋषि वहाँ स्नान तथा भगवान् शिवका दर्शन करनेके लिये आया करते हैं। यदि मनुष्य मेरे स्थानपर जाकर विशेषरूपसे मेरा पूजन करता है तो उसका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो इस तीर्थमें मेरी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर पूजते हैं, वे मेरे परमधाममें निवास करते हैं। मेरा विग्रह कलियुगमें खड्गधारेश्वरके नामसे विख्यात होता है। सत्ययुगमें मैं 'मन्दिर' कहलाता हूँ और त्रेतामें 'गौरव'। द्वापरमें मेरा 'विश्वविख्यात' नाम होता है और कलियुगमें 'खड्गेश्वर' या 'खड्गधारेश्वर'। इस तीर्थके दक्षिण भागमें मेरा स्थान है—यह जानकर जो विद्वान् वहीं मेरी मूर्ति बनाता और नित्य उसकी पूजा करता है, उसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। वह मानव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है। देवेश्वरि ! जो लोग लोकनाथ महेश्वरको धूप, दीप, नैवेद्य तथा चन्दन आदि अर्पण करते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता।

खड्गधार तीर्थसे दक्षिणकी ओर परम पावन दुग्धेश्वर तीर्थ बताया गया है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस तीर्थमें स्नान करके दुग्धेश्वर शिवका दर्शन करनेपर मनुष्य पापजनित दुःखसे तत्काल छुटकारा पा जाता है। साभ्रमतीके सुन्दर तटपर जहाँ परम पुण्यमयी चन्द्रभागा नदी आकर मिली है, महर्षि दधीचिने भारी तपस्या की थी। वहाँ किये हुए स्नान, दान, जप, पूजा और तप आदि समस्त शुभ कर्म दुग्धतीर्थके प्रभावसे अक्षय होते हैं।

दुग्धेश्वर तीर्थसे पूर्वकी ओर एक परम पावन तीर्थ है, जहाँ साभ्रमतीमें चन्द्रभागा नदी मिली है। वहाँ पुण्यदाता चन्द्रेश्वर नामक महादेवजी नित्य विराजमान रहते हैं। जो सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले, परम महान् और सर्वत्र व्यापक हैं, वे ही भगवान् 'हर' वहाँ निवास करते हैं। उस तीर्थमें चन्द्रमाने दीर्घकालतक तप किया था और उन्होंने ही चन्द्रेश्वर नामक महादेवकी स्थापना की थी। वहाँ स्नान, जलपान और शिवकी पूजा करनेवाले मनुष्य धर्म और अर्थ प्राप्त करते हैं। जो लोग वहाँ विशेषरूपसे वृषोत्सर्ग आदि कर्म करते हैं, वे पहले स्वर्ग भोगकर पीछे शिवधामको जाते हैं। जो दूसरे तटपर जाकर समस्त पापोंका नाश करनेवाले चन्द्रेश्वर नामक