भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 897

८८० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


इन्द्रप्रस्थके द्वारका, कोसला, मधुवन, बदरी, हरिद्वार, पुष्कर, प्रयाग, काशी, काञ्ची और गोकर्ण आदि तीर्थोंका माहात्म्य

राजा शिबि बोले— मुने ! अब मुझे इन्द्रप्रस्थके सैकड़ों तीर्थोंमेंसे अन्य तीर्थोंका भी माहात्म्य बतलाइये।
नारदजीने कहा— राजन् ! इन्द्रप्रस्थके भीतर यह द्वारका नामक तीर्थ है। इसकी महिमा सुनो। काम्पिल्य नगरमें एक बहुत सुन्दर और संगीतज्ञ ब्राह्मण रहता था। उसके गानकी सुरीली ध्वनिसे नगरकी स्त्रियोंके मनोंमें उसके प्रति पाप-वासनायुक्त बड़ा आकर्षण हो गया। नगरके लोगोंने जाकर राजासे शिकायत की। राजाके पूछनेपर ब्राह्मणने अपनेको निर्दोष बताया और नगरकी स्त्रियोंको उच्छृङ्खल। इतनेमें कुछ स्त्रियाँ भी वहाँ आ गयीं और निर्लज्जतापूर्ण बातें करने लगीं। ब्राह्मणने कामवासनाकी और पति-वञ्चनाकी निन्दा करते हुए पातिव्रतकी महिमा बताकर उन स्त्रियोंको समझाया। वे ब्राह्मणकी बात सुनकर बहुत लज्जित हुईं और परस्पर पापी कामकी निन्दा करती हुई अपने घरोंको लौट आयीं। कुछ समय बाद कारूष देशके राजाने काम्पिल्य नगरपर आक्रमण किया और युद्धमें काम्पिल्यराज मारे गये। उनका नगर लुट गया। शूरवीर मारे गये और नगरकी स्त्रियाँ जहर खाकर मर गयीं। जिन स्त्रियोंने संगीतज्ञ ब्राह्मणके प्रति आकर्षित होनेके पापका प्रायश्चित्त नहीं किया था, वे सब-की-सब बड़ी भयानक राक्षसियाँ होकर भूख-प्याससे पीड़ित रहने लगीं। वाणी और मनके किये हुए एक ही पापसे उन्हें दो जन्मोंतक राक्षसी योनिमें रहना पड़ा। अतएव पापसे डरनेवाली किसी भी स्त्रीको मन-वाणीसे कभी किसी भी पराये पतिका सेवन नहीं करना चाहिये। अपना पति रोगी, मूर्ख, दरिद्र और अंधा हो, तो भी उत्तम गतिकी इच्छा रखनेवाली स्त्रियोंको उसका त्याग नहीं करना चाहिये। ये राक्षसियाँ इन्द्रप्रस्थके द्वारका नामक तीर्थसे जल लेकर पुष्कर जाते हुए ब्राह्मणके कमण्डलुसे जलकी कुछ बूँदें पड़ते ही निष्पाप हो गयीं और भयानक राक्षसी-शरीरसे मुक्त होकर स्वर्गमें चली गयीं।

इसी इन्द्रप्रस्थमें कोसला (अयोध्या) नामक एक तीर्थ है। इसके विषयमें भी एक पुण्यमय उपाख्यान है। चन्द्रभागा नदीके किनारे एक पुरीमें चण्डक नामक एक जुआरी, शराबखोर, व्यभिचारी, डकैत, हत्यारा और मन्दिरोंका सामान चुरानेमें चतुर एक नाई रहता था। उसने एक दिन अपने समीप ही रहनेवाले मुकुन्द नामक धार्मिक और धनवान् ब्राह्मणके घरमें चोरी करनेके लिये प्रवेश करके ब्राह्मणको मार डाला। इससे उनकी स्नेहमयी माता और सती पत्नीको बड़ा दुःख हुआ और वे आर्तस्वरसे विलाप करने लगीं। इतनेमें ही मुकुन्दके गुरु वेदायिन नामक संन्यासी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने शरीरकी नश्वरताका वर्णन करते हुए आत्मज्ञानका उपदेश देकर उन लोगोंको समझाया और मुकुन्दका अन्त्येष्टि-संस्कार करवाया। मुकुन्दकी गर्भवती पत्नीको विद्वान् संन्यासीने सती होनेसे रोक दिया। मुकुन्दका छोटा भाई मुकुन्दकी अस्थियोंको लेकर गङ्गाजीमें छोड़नेके लिये चला, चलते-चलते वह इस कोसलातीर्थमें आया। आधी रातको यहाँ अस्थिकी गठरीको एक कुत्तेने उठाकर कोसलाके जलमें फेंक दिया। अस्थियोंके जलमें पड़ते ही मुकुन्द दिव्य विमानपर चढ़कर वहाँ आया और उसने तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करते हुए यह बताया कि 'मेरी हड्डियोंके तीर्थमें पड़ते ही मैं नरकसे निकलकर इस उत्तम गतिको प्राप्त हुआ हूँ। नरक मुझे इसीलिये प्राप्त हुआ था कि मैं गुरुद्रोही था। अब मैं उस पापसे मुक्त होकर चौदह इन्द्रोंके कालतक सुखपूर्वक स्वर्गमें निवास करूँगा।' यों कहकर वह देवताके समान सुन्दर शरीरवाला ब्राह्मण देखते-ही-देखते तत्काल स्वर्गको चला गया।

अब उस चण्डक नाईकी कथा सुनो। मुकुन्दकी हत्याका समाचार पाकर राजाने चण्डकको पकड़ मँगवाया और उसे चन्द्रभागासे आठ कोसकी दूरीपर ले जाकर चाण्डालोंके द्वारा मरवा डाला। वह मारवाड़