पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 899, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें७८२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
यह हरिद्वार पापियोंका भी कल्याण करनेवाला है।' यों कहकर वे स्वर्गलोकको चले गये। दूसरे दिन वैश्यने अपने दोनों पहरेदारोंके शरीरोंका दाह-संस्कार कराकर उनकी हड्डियाँ हरिद्वारतीर्थमें डलवा दीं। इसके परिणामस्वरूप वे दोनों भाग्यवान् स्वर्गसे लौटकर भगवान् विष्णुके परमधाममें चले गये। तदनन्तर
वैश्यने अपने घर जाकर सांसारिक कार्योंको धर्मपूर्वक करते हुए भगवान्की भक्तिमें मन लगाया और अन्तमें इसी वैकुण्ठधामकी प्राप्ति करानेवाले तीर्थमें आकर मृत्युको प्राप्त हुआ।
अब इन्द्रप्रस्थके पुष्करतीर्थका माहात्म्य सुनो। विदर्भ नगरमें मालव नामक एक ब्रह्मवेत्ता, शान्त, विद्वान्, हरिभक्त, देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और समस्त भूत-प्राणियोंके पोषक ब्राह्मण रहते थे। वे एक समय जब बृहस्पति सिंहराशिपर थे, दान करनेके लिये दस हजार स्वर्णमुद्राएँ साथ लेकर गोदावरी नदीमें स्नान करनेको चले। उन्होंने आधे रुपये अपने पुण्डरीक नामक भानजेको देनेका विचार किया और आधे अन्यान्य श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको। गोदावरीके तटपर पहुँचनेके बाद मालवके बुलाये हुए उनके भानजे पुण्डरीक भी वहीं आ गये और उन्होंने अपना आधा धन पुण्डरीकको दे दिया। पुण्यात्मा पुण्डरीकने अपने धनमेंसे चौथाई भाग प्रसन्नतापूर्वक श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दिया। इसके बाद वे अपने मामा मालवसे उपदेश, आशीर्वाद और सन्देश प्राप्त करके अपने घरकी ओर लौटे और कुछ दिनों बाद इस कल्याणप्रद तीर्थमें आये। यहाँ आकर अपने छोटे भाई भरतको खूनसे लथपथ और अन्तिम श्वास लेते हुए पृथ्वीपर पड़ा देखा। कुछ ही देरमें पीड़ासे छटपटाकर उसने प्राण त्याग दिये। उसी समय आकाशसे एक विमान उतरा और दिव्य देह धारण करके भरत उसपर जा बैठा। फिर उस समय भरतने भाई पुण्डरीकसे कहा—'भाईजी! इस समय मैं तुम्हें मारकर मामाका दिया हुआ धन छीननेके लिये आया था और तुम्हारी ही घातमें था। परन्तु आधी रातके समय बाहरसे आये हुए व्यापारियोंके सेवकोंने मुझे चोर समझकर मार दिया। पर इस पुष्करतीर्थके प्रसादसे मैंने दिव्य देह प्राप्त कर ली। मैं एक बार बाजारमें किसी अनाथ बालकको मरा देखकर उसे उठाकर गङ्गाजीके सुन्दर तटपर ले गया था और कफन आदिसे ढककर उसका दाह-संस्कार किया था। उसी पुण्यसे मुझे इस तीर्थकी प्राप्ति हुई।'
धर्मात्मा पुण्डरीकने भाई भरतकी सद्गति देखकर अपने हृदयमें अनुमान किया कि यह तीर्थ मनःकामना पूर्ण करनेवाला है। फिर उन्होंने 'माघभर भगवान् विष्णु अपने साक्षात् स्वरूपसे मेरे घरमें पधारकर निवास करें' इस कामनासे पुष्करतीर्थमें स्नान किया। तदनन्तर घर लौटकर पौषकी पूर्णिमाके दिन घरको भलीभाँति सजाकर उत्सव किया, ब्राह्मणभोजन करवाया और भगवान्का गुणगान करते हुए जागरण किया। भगवान्के पधारनेकी प्रतीक्षा तो थी ही। दूसरे दिन सचमुच ही भगवान् उसके घर पधार गये। पुण्डरीकने आनन्दमग्न होकर आसन, अर्घ्य आदिके द्वारा भगवान्की पूजा की और फिर स्तवन करके माघभर घरमें निवास करनेके लिये उनसे प्रार्थना की। भगवान् उसके द्वारा विविध भाँतिसे पूजित होकर पूरे माघभर उसके घरमें रहे और अन्तमें उसको सर्वतीर्थशिरोमणि इन्द्रप्रस्थके पुष्करतीर्थमें लाकर स्नान कराया। बस, उसी समय पुण्डरीकके शरीरसे एक दिव्य ज्योति निकली और वह भगवान् गोविन्दके चरणोंमें समा गयी।
अब इन्द्रप्रस्थके प्रयागकी महिमा सुनो। नर्मदा नदीके किनारे माहिष्मतीपुरीमें एक रूप-यौवन-सम्पन्ना, नाच-गानमें निपुण मोहिनी नामकी वेश्या रहती थी। धनके लोभमें उसने अनेकों महापाप किये थे। वृद्धावस्था आनेपर उसको सुबुद्धि आयी और उसने अपना धन बगीचे, पोखरे, बावली, कुआँ, देवमन्दिर और धर्मशाला बनवानेमें लगाया। यात्रियोंके लिये भोजन और जगह-जगह जलकी भी व्यवस्था की। एक बार वह बीमार पड़ी। अपना सारा धन ब्राह्मणोंको देना चाहा, पर ब्राह्मणोंके न लेनेपर उसने एक भाग अपने दासियोंको और दूसरा परदेशी यात्रियोंको दे दिया। स्वयं निर्धन हो गयी। इस समय जरद्गवा नामक मोहिनीकी