पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
सदा ही इस पुण्यप्रद दमाध्यायको दूसरोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है तथा वहाँसे कभी नहीं गिरता।
धर्मका सार सुनो और सुनकर उसे धारण करो—जो बात अपनेको प्रतिकूल जान पड़े, उसे दूसरोंके लिये भी काममें न लाये। जो परायी स्त्रीको माताके समान, पराये धनको मिट्टीके ढेलेके समान और सम्पूर्ण भूतोंको अपने आत्माके समान जानता है, वही ज्ञानी है। जिसकी रसोई बलिवैश्वदेवके लिये और जीवन परोपकारके लिये है, वही विद्वान् है। जैसे धातुओंमें सुवर्ण उत्तम है, वैसे ही परोपकार सबसे श्रेष्ठ धर्म है, वही सर्वस्व है। सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका ध्यान रखनेवाला पुरुष अमृतत्व प्राप्त करता है।
**पुलस्त्यजी कहते हैं—**इस प्रकार ऋषियोंने शुनःसखके सामने धर्मके सार-तत्त्वका प्रतिपादन करके उसके साथ वहाँसे दूसरे वनमें प्रवेश किया। वहाँ भी उन्हें एक बहुत विस्तृत जलाशय दिखायी दिया, जो पद्म और उत्पलोंसे आच्छादित था। उस सरोवरमें उतरकर उन्होंने मृणाल उखाड़े और उन्हें ढेर-के-ढेर किनारेपर रखकर जलसे सम्पन्न होनेवाली पुण्यक्रिया—सन्ध्या-तर्पण आदि करने लगे। तत्पश्चात् जब वे जलसे बाहर निकले तो उन मृणालोंको न देखकर परस्पर इस प्रकार कहने लगे।
**ऋषि बोले—**हम सब लोग क्षुधासे कष्ट पा रहे हैं—ऐसी दशामें किस पापी और क्रूरने मृणालोंको चुरा लिया?
जब इस तरह कुछ पता न लगा तब सबसे पहले **कश्यपजी बोले—**जिसने मृणालकी चोरी की हो, उसे सर्वत्र सब कुछ चुरानेका, थाती रखी हुई वस्तुपर जी ललचानेका और झूठी गवाही देनेका पाप लगे। वह दम्भपूर्वक धर्मका आचरण और राजाका सेवन करने, मद्य और मांसका सेवन करने, सदा झूठ बोलने, सूदसे जीविका चलाने और रुपया लेकर लड़की बेचनेके पापका भागी हो।
**वसिष्ठजीने कहा—**जिसने उन मृणालोंको चुराया हो, उसे ऋतुकालके बिना ही मैथुन करने, दिनमें सोने, एक दूसरेके यहाँ जाकर अतिथि बनने, जिस गाँवमें एक ही कुँआ हो वहाँ निवास करने, ब्राह्मण होकर शूद्रजातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेका पाप लगे और ऐसे लोगोंको जिन लोकोंमें जाना पड़ता है, वहीं वह भी जाय।
**भरद्वाज बोले—**जिसने मृणाल चुराये हों, वह सबके प्रति क्रूर, धनके अभिमानी, सबसे डाह रखनेवाले, चुगलखोर और रस बेचनेवालेकी गति प्राप्त करे।
**गौतमने कहा—**जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, वह सदा शूद्रका अन्न खानेवाले, परस्त्रीगामी और घरमें दूसरोंको न देकर अकेले मिष्ठान्न भोजन करनेवालेके समान पापका भागी हो।
**विश्वामित्र बोले—**जो मृणाल चुरा ले गया हो, वह सदा काम-परायण, दिनमें मैथुन करनेवाले, नित्य पातकी, परायी निन्दा करनेवाले और परस्त्रीगामीकी गति प्राप्त करे।
**जमदग्निने कहा—**जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, वह दुर्बुद्धि मनुष्य अपने माता-पिताका अपमान करनेके, अपनी कन्याके दिये हुए धनसे अपनी जीविका चलानेके, सदा दूसरेकी रसोईमें भोजन करनेके, परस्त्रीसे सम्पर्क रखनेके और गौओंकी बिक्री करनेके पापका भागी हो।
**पराशरजी बोले—**जिसने मृणाल चुराये हों, वह दूसरोंका दास एवं जन्म-जन्म क्रोधी हो तथा सब प्रकारके धर्मकर्मोंसे हीन हो।
**शुनःसखने कहा—**जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, वह न्यायपूर्वक वेदाध्ययन करे, अतिथियोंमें प्रीति रखनेवाला गृहस्थ हो, सदा सत्य बोले, विधिवत् अग्निहोत्र करे, प्रतिदिन यज्ञ करे और अन्तमें ब्रह्मलोकको जाय।
**ऋषियोंने कहा—**शुनःसख! तुमने जो शपथ की है, वह तो द्विजातिमात्रको अभीष्ट ही है; अतः तुम्हींने हम सबके मृणालोंकी चोरी की है।
**शुनःसख बोले—**ब्राह्मणो! मैंने ही आपलोगोंके मुँहसे धर्म सुननेकी इच्छासे ये मृणाल छिपा