भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०४* अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् *[ संक्षिप्त पद्मपुराण

मस्तकपर वस्त्र डालकर यलपूर्वक मौन रहे। न तो थूके और न ऊपरको साँस ही खींचे। शौचके स्थानपर अधिक देरतक न रुके। मलकी ओर दृष्टिपात न करे। अपने शिश्नको हाथसे पकड़े हुए उठे और अन्यत्र जाकर आलस्यरहित हो गुदा और लिङ्गको अच्छी तरह धो डाले। किनारेकी मिट्टी लेकर उससे इस प्रकार अङ्गोंकी शुद्धि करे, जिससे मलकी दुर्गन्ध और लेप दूर हो जाय। किसी पवित्र तीर्थमें शौचकी क्रिया (गुदा आदि धोना) न करे; यदि करना हो तो किसी पात्रमें जल निकालकर उससे अलग जाकर शौच-कर्म करे। लिङ्गमें एक बार, गुदामें पाँच बार तथा बायें हाथमें दस बार मिट्टी लगाये। दोनों पैरोंमें पाँच-पाँच बार मिट्टी लगाकर धोये। इस प्रकार शौच करके मिट्टी और जलसे हाथ-पैर धोकर चोटी बाँध ले और दो बार आचमन करे। आचमनके समय हाथ घुटनोंके भीतर होना चाहिये। पवित्र स्थानमें उत्तर या पूरबकी ओर मुँह करके हाथमें पवित्री धारण किये आचमन करना चाहिये। इससे पवित्री जूठी नहीं होती। यदि पवित्री पहने हुए ही भोजन कर ले तो वह अवश्य जूठी हो जाती है। उसको त्याग देना चाहिये।

तदनन्तर उठकर दोनों नेत्र धो डाले और दन्तधावन (दातुन) करे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च।
ब्रह्मप्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥
(२३३। १७)

'वनस्पते! आप हमें आयु, बल, यश, तेज, सन्तान, पशु, धन, वेदाध्ययनकी बुद्धि तथा धारणाशक्ति प्रदान करें।'

इस मन्त्रका पाठ करके दातुन करे। दातुन काँटेदार या दूधवाले वृक्षकी होनी चाहिये। उसकी लंबाई बारह अंगुलकी हो और उसमें कोई छेद न हो। मोटाई भी कनिष्ठिका अँगुलीके बराबर होनी चाहिये। रविवारको दातुन निषिद्ध है, उस दिन बारह कुल्लोंसे मुखकी शुद्धि होती है। तत्पश्चात् आचमन करके शुद्ध हो विधिपूर्वक प्रातःस्नान करे। स्नान... देवता और पितरोंका तर्पण करे। फिर उठकर दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। विज्ञ ब्राह्मणको उत्तरीय वस्त्र (चादर) सदा ही धारण किये रहना चाहिये। आचमनके बाद भस्मके द्वारा ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करे अथवा गोपीचन्दन घिसकर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाये। तदनन्तर सन्ध्यावन्दन आरम्भ करके प्राणायाम करे। 'आपो हि ष्ठा०' आदि तीन ऋचाओंसे कुशोदकद्वारा मार्जन करे। पूर्वोक्त ऋचाओंमेंसे एक-एकका प्रणवसहित उच्चारण करके जल सींचे। फिर 'सूर्यश्च०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित जलका आचमन करे। तत्पश्चात् दोनों हाथोंमें जल लेकर उसे गायत्रीसे अभिमन्त्रित करे और सूर्यकी ओर मुँह करके खड़ा हो तीन बार ऊपरको वह जल फेंके। इस प्रकार सूर्यको अर्घ्यदान करना चाहिये। प्रातःकालकी सन्ध्या जब तारे दिखायी देते हों, उसी समय विधिपूर्वक आरम्भ करे और जबतक सूर्यका दर्शन न हो जाय, तबतक गायत्री-मन्त्रका जप करता रहे। इसके बाद सविता-देवता-सम्बन्धी पापहारी मन्त्रोंद्वारा हाथ जोड़कर सूर्योपस्थान करे। सन्ध्याकालमें गुरुके चरणोंको तथा भूमिदेवीको प्रणाम करे। जो द्विज श्रद्धा और विधिके साथ प्रतिदिन सन्ध्योपासन करता है, उसे तीनों लोकोंमें कुछ भी अप्राप्य नहीं। सन्ध्या समाप्त होनेपर आलस्य छोड़कर होम करे। कोई भी दिन खाली न जाने दे। प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करे।

यह दिनके प्रथम भागका कृत्य बतलाया गया। दूसरे भागमें वेदोंका स्वाध्याय किया जाता है। समिधा, फूल और कुश आदिके संग्रहका भी यही समय है। दिनके तीसरे भागमें न्यायपूर्वक कुछ धनका उपार्जन करे। शरीरको क्लेश दिये बिना दैवेच्छासे जो उपलब्ध हो सके, उतनेका ही अर्जन करे। ब्राह्मणके छः कर्मोंमेंसे तीन कर्म उसकी जीविकाके साधन हैं। यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना और शुद्ध आचरणवाले यजमानसे दान लेना—ये ही उसकी आजीविकाके तीन कर्म हैं। दिनके चौथे भागमें पुनः स्नान करे। [प्रातःकाल सन्ध्या-वन्दनके पश्चात्] कुशके आसनपर बैठे और दोनों हाथोंमें कुश ले अञ्जलि बाँधकर ब्रह्मयज्ञकी पूर्तिके लिये यथाशक्ति