पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
भोजनमें मन लगाकर पहले मधुर रस ग्रहण करे, बीचमें नमकीन और खट्टी वस्तुएँ खाय। उसके बाद कड़वे और तिक्त पदार्थोंको ग्रहण करे। पहले रसदार चीजें खाय, बीचमें गरिष्ठ अन्न भोजन करे और अन्तमें पुनः द्रव पदार्थ ग्रहण करे। इससे मनुष्य कभी बल और आरोग्यसे हीन नहीं होता। संन्यासीको आठ ग्रास, वनवासीको सोलह ग्रास और गृहस्थको बत्तीस ग्रास भोजन करने चाहिये। ब्रह्मचारीके लिये ग्रासोंकी कोई नियत संख्या नहीं है। द्विजको उचित है कि वह शास्त्र-विरुद्ध भक्ष्य-भोज्यादि पदार्थोंका सेवन न करे। सूखे और बासी अन्नको भोजन करनेके योग्य नहीं बतलाया गया है। भोजनके पश्चात् शास्त्रोक्त विधिसे आचमन करके एकाग्रचित्त हो हाथ और मुँहकी शुद्धि करे। मिट्टी और जलसे खूब मल-मलकर धोये। तदनन्तर कुल्ला करके दाँतोंके भीतरी भागका— उनकी सन्धियोंका [तिनके आदिकी सहायतासे] शोधन करे। फिर आचमन करके पात्रको हटा दे और कुछ भीगे हुए हाथसे मुख तथा नासिकाका स्पर्श करे। हथेलीसे नाभिका स्पर्श करे। तत्पश्चात् शुद्ध एवं शान्तचित्त होकर आसनपर बैठे और अपने इष्टदेवका स्मरण करे। उसके बाद पुनः आचमन करके ताम्बूल भक्षण करे। भोजन करके बैठा हुआ पुरुष विश्रामके बाद कुछ देरतक ब्रह्मका चिन्तन करे। दिनके छठे और सातवें भागको सन्मार्ग आदिके अविरुद्ध उत्तम शास्त्र आदिके द्वारा मनोरञ्जन और इतिहास-पुराणोंका पाठ करके व्यतीत करे। आठवें भागमें जीविकाके कार्यमें संलग्न रहे। उसके बाद पुनः बाह्य-सन्ध्या—सायं-सन्ध्याका समय हो जाता है।
जब सूर्य अस्ताचलके शिखरपर पहुँच जायँ, तब हाथ-पैर धोकर हाथमें कुश ले एकाग्रचित्त हो सायंकालीन सन्ध्योपासना करे। सूर्यके रहते-रहते ही पश्चिम सन्ध्या प्रारम्भ करे। उस समय सूर्यका आधा मण्डल ही अस्त होना चाहिये। प्राणायाम करके जल-देवता-सम्बन्धी मन्त्रोंसे मार्जन करे। सायंकालमें 'अग्निश्च मा मन्युश्च' इत्यादि मन्त्रके द्वारा और सबेरे 'सूर्यश्च मा मन्युश्च' इत्यादि मन्त्रके द्वारा आचमन करे। सायंसन्ध्यामें पश्चिमाभिमुख बैठकर मौन तथा एकाग्र-चित्त हो रुद्राक्षकी माला ले तारोंके उदय होनेतक प्रणव और व्याहृतियोंसहित गायत्री-मन्त्रका जप करे। फिर वरुण-देवतासम्बन्धिनी ऋचाओंसे सूर्योपस्थान करके प्रदक्षिणा करते हुए प्रत्येक दिशा और दिक्पालको पृथक्-पृथक् नमस्कार करे। इस प्रकार सायंकालकी सन्ध्योपासना करके अग्निहोत्र करनेके पश्चात् कुटुम्बके अन्य लोगोंके साथ भोजन करे। भोजनकी मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिये। भोजनके कुछ काल बाद शयन करे। सायंकाल और प्रातःकालमें भी बलिवैश्वदेव करना चाहिये। स्वयं भोजन न करना हो तो भी बलिवैश्वदेवका अनुष्ठान सदा ही करे; अन्यथा पापका भागी होना पड़ता है। यदि घरपर कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थ पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार उसका यथोचित सत्कार करे। रातमें भोजनके पश्चात् हाथ-पैर आदि धोकर गृहस्थ मनुष्य कोमल शय्यापर सोनेके लिये जाय। शय्यापर तकियेका होना आवश्यक है। अपने घरमें सोना हो तो पूर्व दिशाकी ओर सिरहाना करे और ससुरालमें सोना हो तो दक्षिण दिशाकी ओर। परदेशमें गया हुआ मनुष्य पश्चिम दिशाकी ओर सिर करके सोये। उत्तरकी ओर सिरहाना करके कभी नहीं सोना चाहिये। सोनेके पहले रात्रिसूक्तका जप और सुखपूर्वक शयन करनेवाले देवताओंका स्मरण करे। फिर एकाग्रचित्त होकर अविनाशी भगवान् विष्णुको नमस्कार करके रात्रिमें शयन करे। अगस्त्य, माधव, महाबली मुचुकुन्द, कपिल तथा आस्तीक मुनि—ये पाँचों सुखपूर्वक शयन करनेवाले हैं। माङ्गलिक वस्तुओंसे भरे हुए जलपूर्ण कलशको सिरहानेकी ओर रखकर वरुण-देवता-सम्बन्धी वैदिक मन्त्रोंसे अपनी रक्षा करके सोये। ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करे। सदा अपनी स्त्रीसे ही अनुराग रखे। पत्नीके स्वीकार करनेपर रतिकी इच्छासे उसके पास जाय। पर्वके दिन उसका स्पर्श न करे। रात्रिके पहले और पिछले प्रहरको वेदाभ्यासमें व्यतीत करे और बीचके दोनों प्रहरोंमें शयन करे। ऐसा