भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 942

उत्तरखण्ड ] * भगवान् विष्णुकी महिमा तथा अष्टाक्षर मन्त्रके स्वरूप एवं अर्थका निरूपण * ९२५

पदका अर्थ, अविनाशी, क्षेत्र (शरीर) का अधिष्ठाता, भिन्न-भिन्न रूप धारण करनेवाला, सनातन, जलाने, काटने, गलाने और सुखानेमें न आनेवाला तथा अविनाशी है। ऐसे गुणोंसे युक्त जो जीवात्मा है, वह सदा परमात्माका अङ्गभूत है। वह केवल श्रीहरिका ही दास है और किसीका नहीं। इस प्रकार मध्यम अक्षर उकारके द्वारा जीवके दासभावका ही अवधारण (निश्चय) किया जाता है। इस तरह प्रणवका अर्थ जानना चाहिये। प्रणवका अर्थ स्पष्ट हो जानेपर शेष मन्त्रके द्वारा परमात्माके दासभूत जीवकी परतन्त्रता ही सिद्ध होती है। वह कभी स्वतन्त्र नहीं होता। अतः अपनी स्वतन्त्रताके महान् अहङ्कारको मनसे दूर कर देना चाहिये। अहङ्कार-बुद्धिसे जो कर्म किया जाता है, उसका भी निषेध है।

'मनस्'—मन शब्दमें जो मकार है, वह अहङ्कारका वाचक है और नकार उसका निषेध करनेवाला है। अतः मनसे ही जीवके लिये अहङ्कार-त्यागकी प्रेरणा मिलती है। अहङ्कारसे युक्त मनुष्यको तनिक भी सुख नहीं मिलता। जिसका चित्त अहङ्कारसे मोहित है, वह घोर अन्धकारसे पूर्ण नरकमें गिरता है। इसलिये मनके द्वारा क्षेत्रज्ञकी स्वतन्त्रताका निषेध किया गया है। वह भगवान्‌के अधीन है। भगवान्‌के अधीन ही उसका जीवन है। अतः चेतन जीवात्मा किसी साधनका स्वतन्त्र कर्ता नहीं है। ईश्वरके संकल्पसे ही सम्पूर्ण चराचर जगत् अपने-अपने व्यापारमें लगा है। अतः जीव अपने सामर्थ्यपर निर्भर रहना छोड़ दे। ईश्वरके सामर्थ्यसे उसके लिये कुछ भी अलभ्य नहीं है। अपना सारा भार भगवान् लक्ष्मीपतिको सौंपकर उनकी आराधनाके ही कर्म करे। 'श्रीहरि परमात्मा हैं। मैं सदा उनका दास बना रहूँ।' इस भावसे स्वेच्छापूर्वक अपने आत्माको ईश्वरकी सेवामें लगाना चाहिये। इस प्रकार मनके द्वारा अहंता, ममताका त्याग करना उचित है। देहमें जो अहंबुद्धि होती है, वही संसार-बन्धनका मूल कारण है। वही कर्मोंके बन्धनमें डालती है। अतः विद्वान् पुरुष अहङ्कारको त्याग दे।*

पार्वती ! अब मैं 'नारायण' शब्दकी व्याख्या करता हूँ। शुभे ! नर अर्थात् जीवोंके समुदायको नार कहते हैं। उन 'नार' शब्दवाच्य जीवोंके अयन—गति अर्थात् आश्रय परम पुरुष श्रीविष्णु हैं। अतः वे नारायण कहलाते हैं। अथवा नार यानी जीव उन भगवान्‌के अयन—निवासस्थान हैं। इसलिये भी उन्हें नारायण कहा जाता है। जड-चेतनरूप जितना भी जगत् देखा या सुना जाता है, उसको पूर्णरूपसे व्याप्त करके भगवान् नित्य विराजमान हैं। इसलिये उनका नाम नारायण है। जो कल्पके अन्तमें सम्पूर्ण जगत्‌को अपना ग्रास बनाकर अपने ही भीतर धारण करते हैं और सृष्टिके आरम्भकालमें पुनः सबकी सृष्टि करते हैं, वे भगवान् नारायण कहे गये हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत् नार कहलाता है। उसको जिनका संग नित्य प्राप्त है अथवा उसे जिनके द्वारा उत्तम गति प्राप्त होती है, उन्हें नारायण कहते हैं। जलसे फेनकी भाँति जिनसे सम्पूर्ण लोक उत्पन्न होते और पुनः जिनमें लीन हो जाते हैं, उन भगवान्‌को नारायण कहा गया है। जो अविनाशी पद, नित्यस्वरूप तथा नित्यप्राप्त भोगोंसे सम्पन्न हैं, साथ ही जो सम्पूर्ण जगत्‌का शासन करनेवाले हैं, उन भगवान्‌का नाम नारायण है। दिव्य, एक, सनातन और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीहरि ही नारायण कहलाते हैं। द्रष्टा और दृश्य, श्रोता और श्रोतव्य, स्पर्श


* यहाँ मूलमें 'मनस्' शब्दका पाठ होनेसे मनका ही उल्लेख किया गया है; किन्तु प्रकरण देखनेसे मालूम होता है, 'मनस्' की जगह 'नमस्' पाठ होना चाहिये। यहाँ अष्टाक्षर मन्त्रकी व्याख्या चल रही है; मन्त्रका स्वरूप है—'ॐ नमो नारायणाय।' इसमें ॐकारकी व्याख्या विस्तारके साथ की गयी है; इसके बाद 'नमस्' की व्याख्याका प्रसङ्ग है, जिसे शायद भूलसे 'मनस्' लिखा गया है। इसके आगे 'नारायणाय' पदकी व्याख्या मिलती है। अतः यहाँ 'मनस्'के मकार-नकारसे जो भाव लिया गया है, वह 'नमः' के नकार-मकारका भाव है—ऐसा समझना चाहिये।