भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सृष्टिखण्ड ] * भीमद्वादशी-व्रतका विधान * ८१


भीमद्वादशी-व्रतका विधान

भीष्मजीने कहा—विप्रवर ! भगवान् शङ्करने जिन वैष्णव-धर्मोंका उपदेश किया है, उनका मुझसे वर्णन कीजिये। वे कैसे हैं और उनका फल क्या है ?

पुलस्त्यजी बोले—राजन् ! प्राचीन रथन्तर कल्पकी बात है, पिनाकधारी भगवान् शङ्कर मन्दराचल-पर विराजमान थे। उस समय महात्मा ब्रह्माजीने स्वयं ही उनके पास जाकर पूछा—'परमेश्वर ! थोड़ी-सी तपस्यासे मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ?' ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर जगत्‌की उत्पत्ति एवं वृद्धि करनेवाले विश्वात्मा उमानाथ शिव मनको प्रिय लगने-वाले वचन बोले।

महादेवजीने कहा—एक समय द्वारकाकी सभामें अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्ण वृष्णिवंशी पुरुषों, विद्वानों, कौरवों और देव-गन्धर्वोंके साथ बैठे हुए थे। धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली पौराणिक कथाएँ हो रही थीं। इसी समय भीमसेनने भगवान्‌से परमपदकी प्राप्तिके विषयमें पूछा। उनका प्रश्न सुनकर भगवान् श्रीवासुदेवने कहा—'भीम ! मैं तुम्हें एक पापविनाशिनी तिथिका परिचय देता हूँ। उस दिन निम्नाङ्कित विधिसे उपवास करके तुम श्रीविष्णुके परम धामको प्राप्त करो। जिस दिन माघ मासकी दशमी तिथि आये, उस दिन समस्त शरीरमें घी लगाकर तिलमिश्रित जलसे स्नान करे तथा 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। 'कृष्णाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी और 'सर्वात्मने नमः' कहकर मस्तककी पूजा करे। 'वैकुण्ठाय नमः' इस मन्त्रसे कण्ठकी और 'श्रीवत्सधारिणे नमः' इससे हृदयकी अर्चा करे। फिर 'शङ्खिने नमः', 'चक्रिणे नमः', 'गदिने नमः', 'वरदाय नमः' तथा 'सर्वं नारायणः' (सब कुछ नारायण ही है)—ऐसा कहकर आवाहन आदिके क्रमसे भगवान्‌की पूजा करे। इसके बाद 'दामोदराय नमः' कहकर उदरका, 'पद्मजनाय नमः' इस मन्त्रसे कमरका, 'सौभाग्यनाथाय नमः' इससे दोनों जाँघोंका, 'भूतधारिणे नमः' से दोनों घुटनोंका, 'नीलाय नमः' इस मन्त्रसे पिंडलियों (घुटनेसे नीचेके भाग) का और 'विश्वसृजे नमः' इससे पुनः दोनों चरणोंका पूजन करे। तत्पश्चात् 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'व्युष्ट्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे। इसके बाद 'वायुवेगाय नमः', 'पक्षिणे नमः', 'विषप्रमथनाय नमः', 'विहङ्गनाथाय नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा गरुड़की पूजा करनी चाहिये।

इसी प्रकार गन्ध, पुष्प, धूप तथा नाना प्रकारके पकवानोंद्वारा श्रीकृष्णकी, महादेवजीकी तथा गणेशजीकी भी पूजा करे। फिर गौके दूधकी बनी हुई खीर लेकर घीके साथ मौनपूर्वक भोजन करे। भोजनके अनन्तर विद्वान् पुरुष सौ पग चलकर बरगद अथवा खैरकी दाँतन ले उसके द्वारा दाँतोंको साफ करे; फिर मुँह धोकर आचमन करे। सूर्यास्त होनेके बाद उत्तराभिमुख बैठकर सायङ्कालकी सन्ध्या करे। उसके अन्तमें यह कहे—'भगवान् श्रीनारायणको नमस्कार है। भगवन् !