पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत। १०७ दो० अय शठ मरों बुद्धि गई पाती प्रेमपियारे हाथ। भेंट होत दुख रोय सुनावत जीव जात जो साथ॥ कंचनतार १ बाँधगये २ पाती। लैगा सुवा जहां धनराती॥ जैसे कमल सूर्य की आसा। तोर कंथ बहु मरै पियासा॥ बिसरा भोग सेज सुख बासू। जहाँ भँवर सब तहां हुलासू॥ तवलगि धीर सुना नहिं पीउ। सुना तो घड़ी रहै नहिं जीउ॥ तवलगि सुख हियँ प्रेम न जामा। जहां प्रेमका सुख विश्रामा॥ अगर चंदन दुखदहे शरीरूं। औ भा अगिनकणों करचीरूँ॥ कथा कहानी सुनि सुठि जरा। जानो घीव बसन्दरै परा॥ दो० बिरहन आप सँभारे मैल चीर शिर रूख। पिउपिउ करत रातदिन, पपिहा मुख मै सूख॥ ततखन गा हीरामने आई। मरत पियास ओह जनु पीई॥ भल तुम सुआ कीन्ह है फेरा। गाँठि नजानहु प्रीतम केरा॥ बातहिं जानो विषम पहारा। हृदये नमिला न होय निराराँ॥ मर्म पानि कर जानि पियासी। जो जल मैहें ताकहँ काआसा॥ का रानी यहि पूँछहु बाता। जन कोई होय प्रेमकर राताँ॥ तुम्हरे दरशनलाग वियोगी २४। अहा सो महादेव मठ योगी॥ तुम वसन्तलै तहां सिधाई। देव पूज पुनि औ फिर आई॥ दो० दृष्टि २५ बान तस मारेहु खाय रहा तेहि ठांव। दूसर बार न बोलहि लै पद्मावत नांव॥ ० खाली १ सोनेका तार २ गरदन ३ अर्थात् पद्मावत ४ खाविन्द ५ खुशी ६ दिल ७ आराम ८ जलना ६ बदन १०-११ कपड़ा १२-१४ आग १३ उसी वक्त १५ नाम तोता १६ मुश्किल १७ टेढ़ा १८ दिल १६ अलग २० भेद २१ पानी २२ अर्थात् दीवाना २३ दुःखी २४ निगाह २५ जगह २६॥