पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 318 में से
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पद्मावत । ११ चांद जैसोजगं विधि$^१$ अवतारौ$^२$। दीन्ह कलंककीन्ह उजियारा॥ जग$^३$ सूझा एकै नयनाहां$^४$। उआशूक$^५$ जस नखतनमांहां॥ जौलहि अंबहि$^६$ डाभँ$^७$ नहोय। तौलहिसुगंध$^८$ बसाय न कोय॥ कीन्हि समुद्र जो पानी खारा। तौ अतिभयोअसूझि अपारं॥$^९$ जो सुमेरु$^{१०}$ त्रिशूल बिनाशा। भा कंचनगढ़ै$^{११}$ लाग अकाशा॥ जौलहिघरी कलंकै$^{१२}$ नहिं परा। कांच होय नहिं कंचन$^{१३}$ करा॥ ॥ दो० एकनयनँ जस दरपणं$^{१५}$, औ निरमलं$^{१६}$ तेहिभाव। सब रूपवंत$^{१७}$ पाँउगहि, मुखजोवने$^{१८}$ की चाव॥ चार मीतं$^{१९}$ कवि मुहम्मदपाये। जोरि मिताई$^{२०}$ सर पहुँचाये॥ यूसुफमलिकपंडितवहुज्ञानी। पहिली बात भेद उन जानी॥ पुनि सलारकादम मतिमाहां। खांडे शूर उभानेतं बाहां॥$^{२१}$ मिया सलोनी सिंहंबरयारू$^{२३}$। वीरकहत रणखड़गे$^{२४}$ जुझारू॥ शेखबड़ीवड़िसिद्धि$^{२५}$ बखानों। कें अदेश सिद्धि बड़ बानी॥$^{२६}$ चाखो चतुरदर्शो गुण पढ़े। औसिंहं योगगुसाईं$^{२६}$ गढ़े॥$^{३०}$ वृक्ष$^{३१}$ होय जो चन्दन पासा। चन्दनहोय विविधतेहिवासा॥ दो० मुहम्मद चाखोमीतं$^{३२}$ मिलि, भये जो एकैचित्त। यहजगँ साथ जो बैठे, वहजगै$^{३३}$ बिछुरन कित्त॥ जायसनगर धर्म$^{३४}$ अस्थानू$^{३५}$। तहांजायकवि कीन्ह बखानू॥$^{३६}$ औबिनती$^{३७}$ पंडितनसोभजा। टूटिसँवारे मेरु बहु सजा॥$^{३८}$ दुनिया १ ईश्वर २ पैदा किया ३ संसार ४ आंखें ५ नामसितारा ६ आंब ७ दाग़ ८ खुशबू ६ जिसका किनारा न हो १० नामपहाड़ जिसको महादेवजीने त्रिशूलसे खोदा या ११ सोनेका क़िला १२ दाग़ १३ सोना खालिस १४ आँख १५ आईना १६ पाकसाफ़ १७ खूबसूरत १८ मुंह देखना १६ दोस्त २० दोस्ती २१ तलवार बहादुर २२ बलन्दहाथ २३ शेर ज़बरदस्त २४ तलवार २५ मर्दकामिल २६ मशहूर २७ चौदहों विद्या के जाननेवाले २८ शेर २६ ईश्वर ३० पेड़ ३१ यार ३२ दुनिया ३३-३४ मकान ३५ बयानफरमा ३६ आज़ज़ी ३७ सब तरह आरास्ता ३८॥