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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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[Header] पद्मावत। १४१ चार खम्भ चारहुँदिश धरे। हीरा रतन १ पदारथ जरे॥ माणिकै दिया जड़े औ मोती। होय उजियार रहा तेहिज्योती॥ ऊपर रातोँ चंदवा छावा। औ मुँइसुरँग विछावत्रिविछीवा॥ तेहिमहँ पलँग सेज सुखदासी। कीन्हेविछावन फूलहिवासी ॥ दोहुँदिश गेंदवा औगल सोई। कांची पार्ट भरी धुन रोई॥ फूलहिं भरे ऐसो केहि योगू। को तहँ पौढ़ मानरस भोगू ॥ दो० अतिसुकमार सेज सो डाँसी, छुवै न पावै कोय। देखत नवै खनहिं खन, पांव धरत रिस होय ॥ राज तपत सेज जो पाई। गाँठ छोरि धन सखिन छिपाइ॥ अह्रै कुँवर हमरे अस चारु। आजुकुँवरकर करब शिंगारू ॥ हरद उतारि चढ़ावव रंगू। तब निशि० चांद सूर्य्य सो संगू ॥ जनु चातकै मुख बूँद सेवाती। राजा चकचौहत तेहिभांती ॥ योग छूटि जनु अपसर साथा। योग हाथकर भयो बिहाथा ॥ वै चतुरों कर लै अपनैसई। मित्र अमोल छीन लैगई ॥ बैठा खोय जरी औ बूटी। लाभ न पाव मूल भइ टूटी ॥ दो० खाय रहा ठग लाडू, तन्त मन्त बुधि खोय। धौराहरे बनखंडेँ भयो, ना हँसि आव न रोय॥ अस तप करतभयो दिनभारी। चार पहर बीते युग चारी ॥ परीसांझ पुनि सखी सो आई। चांद रहा अपनी जो तराई ॥ पूँछहिं गुरु कहारे चेला। विनशेशि रेकस सूर अकेला॥ धात कमाय सिखे तूँ योगी। अबकसजसनिरधातबियोगी ॥ चारोतरफ १ जवाहिरात २-३ लाल ४- तकिया ५ रेशम ६ बिछौना ७ पद्मावत ८ रस्म ६ रात १० पपीहा ११ होशियारी १२ छिपजाना १३ महल १४ जंगल १५ छोटे नखत १६ चांद १७ सूर्य १८ दुखी १६ ॥ ...