पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ पद्मावत । दो० लीलरहा अब ढीलैं है, पेटपदारथै मेल । को उजियार करै जग, झांपा चन्द उघेल॥ ए गुसाँईं तू सिरजन हारू । तुझिरजायहि समुद्रअपारू ॥ तुइअसगगन अन्तरिक्षराखा । जहां न टेक न थूनि नखांभा ॥ तुइ जल ऊपर धरती राखी । जगत भार लै भार न थाकी ॥ चांद सूर्य्य औ नखतहिंपाती । तोरे डर धावहिं दिन राती ॥ पानी पवन आग औ माटी । सबकी पीठ तोरहें सांटी ॥ सोइ मूरुख औ बावर अन्धा । तोहिंछांड़ चित्तऔरहिवन्धा ॥ घट घट जगत तोरहै दीठी । हौं अन्धा जेहि सूझ न पीठी ॥ दो० पवनं हिये भापानी, पानि हिये भइ आग । आग हिये भइ माटी, गोरखधन्धे लाग ॥ तुइँ जिवतन मिल बसदैआऊ । तुहीं विछोवेसे करेसि मिलाऊ ॥ चौदहभुवन सो तोरे हाथा । जहँलगिविछुड़ीआवकसाथा ॥ सब कर मर्म भेदतोहिपाहां । रोम जमावसि टूटी जाहां ॥ जानेसि सबै अवस्थान मोरी । जस बिछुड़ी सारसकी जोरी ॥ एक मुई रुर मुई सो दूजी । रहा न जाय आयु अब पूजी ॥ झूरत तपत दरधै का मरों । कल्पोंमाथ वेगे मिसन्तरों ॥ मरों सो ले पद्मावत नाऊँ । तुइँ कँत्तार करेसि इकठाऊँ ॥ दो० दुख तो प्रीतम देखिये, सुख नहिं सोवे कोय । यही ठाउँ तन डरपै, मिलन बिछोवाँ होय ॥ वेडर १ लाल ज़वाहिर २ ईश्वर ३ पैदा करनेवाला ४ आसमान ५ बीचोबीच में लटकाहुश्रा ६ सहारा ७ कोड़ा ८ निगाह ६ हवा १० दिल ११ जुदाई १२ सात परदा आसमान सात परदा ज़मीन १३ भेद १४ हाल १५ उमरतमाम १६ जलाना १७ शिरकटाना १८ जल्द १६ नजात २० ईश्वर २१ जगह २२ जुदाई २३ ॥